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जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की तैयारी, मॉनसून सत्र में सरकार ला सकती है प्रस्ताव

केंद्र सरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ संसद के आगामी मॉनसून सत्र में महाभियोग प्रस्ताव लाने पर विचार कर रही है। यह कदम उनके दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास पर 14 मार्च, 2025 को आग लगने की घटना के बाद बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने के विवाद के बाद उठाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने जस्टिस वर्मा को इस मामले में दोषी पाया है, जिसके बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को जांच रिपोर्ट भेजी है।

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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(4) और जज (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत, किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को “सिद्ध कदाचार” या “अक्षमता” के आधार पर महाभियोग के जरिए हटाया जा सकता है। इसके लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ प्रस्ताव पेश करना होता है। प्रस्ताव को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित करना आवश्यक है।

सूत्रों के अनुसार, सरकार इस प्रस्ताव के लिए विपक्षी दलों से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है ताकि संसद में सर्वसम्मति बन सके। सरकार की योजना जांच समिति की रिपोर्ट को प्रस्ताव के मसौदे में शामिल करने की है, जिसमें जस्टिस वर्मा के आवास से जली हुई नकदी की बरामदगी का विस्तृत विवरण है। एक सूत्र ने कहा, “ऐसे स्पष्ट घोटाले को अनदेखा करना मुश्किल है।”

जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला तब सुर्खियों में आया जब उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास के स्टोर रूम में आग लगने के बाद फायर ब्रिगेड की टीम को जली हुई नकदी की गड्डियां मिली थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए 22 मार्च, 2025 को तीन सदस्यीय पैनल गठित किया, जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी.एस. संधावालिया, और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थे।

जांच में नकदी की मौजूदगी की पुष्टि हुई, लेकिन जस्टिस वर्मा ने दावा किया कि उन्हें या उनके परिवार को इस नकदी की जानकारी नहीं थी और उनके खिलाफ साजिश रची गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उनसे तीन सवाल पूछे थे: नकदी का स्रोत, इसकी मौजूदगी का हिसाब, और 15 मार्च को जले नोट निकालने वाले व्यक्ति की पहचान। वर्मा ने लिखित जवाब में नकदी की जानकारी से इनकार किया।

इस विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा का तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से उनके मूल कार्यक्षेत्र इलाहाबाद हाईकोर्ट में कर दिया। केंद्र सरकार ने 28 मार्च, 2025 को इसकी अधिसूचना जारी की। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया कि जस्टिस वर्मा को कोई न्यायिक कार्य न सौंपा जाए। इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने उनके तबादले का कड़ा विरोध किया और इसे रद्द करने की मांग की। एसोसिएशन ने महाभियोग और सीबीआई-ईडी जांच की मांग भी उठाई है।

सूत्रों के मुताबिक, यदि जस्टिस वर्मा स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं देते, तो सरकार जुलाई 2025 के तीसरे सप्ताह में शुरू होने वाले मॉनसून सत्र में महाभियोग प्रस्ताव पेश कर सकती है। यह प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित होने के बाद राष्ट्रपति के पास जाएगा, जो जज को हटाने का अंतिम आदेश दे सकते हैं।

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