कल आऊँगा "माँ" ,बेटे के आस में माँ के प्राण निकल गए लेकिन नही आया बेटा, रिनपास से एक माँ की दर्दनाक दास्तां

कल आऊँगा “माँ” ,बेटे के आस में माँ के प्राण निकल गए लेकिन नही आया बेटा, रिनपास से एक माँ की दर्दनाक दास्तां

कल आऊँगा, माँ” बेटे के आस में माँ के प्राण निकल गए… लेकिन नही आया बेटा, रिनपास से एक माँ की दर्दनाक दास्तां

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कल आऊँगा "माँ" ,बेटे के आस में माँ के प्राण निकल गए लेकिन नही आया बेटा, रिनपास से एक माँ की दर्दनाक दास्तां

उसके नाम का कोई खास महत्व नहीं क्योंकि बेटे के लिए माँ है और पति के लिए पत्नी । ये उस माँ और पत्नी की कहानी है जिसका जीवन रांची के रिनपास की उस  वार्ड की दीवारों के बीच इस आस में टूट गयी की उसका बेटा आएगा ।

कहानी 1997 की एक सर्द सुबह पति ने उसे रिनपास में छोड़ा था। कहा था, “कुछ दिन में ठीक होकर घर लौट आएगी।” फिर वो कभी नहीं लौटा। न पत्र, न फोन, न कोई खबर।वर्ष बीतते गए। दवाइयाँ बदलती रहीं, डॉक्टर बदलते रहे, लेकिन उसकी आँखें नहीं बदलीं। वो हर सुबह दरवाजे की ओर देखती। हर शाम सामान बाँधकर रखती। शायद आज कोई आए।फिर एक दिन, कई साल बाद, दरवाजे पर वो खड़ा था—उसका बेटा।

अब जवान, शादीशुदा। साथ में बहू। माँ ने उसे देखा तो आँसू नहीं, बस एक हल्की-सी मुस्कान। वो सामान्य लग रही थी। घंटों बातें हुईं। पुरानी यादें, बचपन की शरारतें, माँ के हाथ का खाना। बेटे ने कुछ कागजों पर दस्तखत कराए। फिर कहा,”माँ, कल आऊँगा। तुम्हें घर ले चलूँगा। सब ठीक हो जाएगा।”

उस रात माँ ने नींद नहीं ली। सुबह होते ही उसने अपना छोटा-सा सामान बाँध लिया—वो कुर्सी पर बैठ गई। आँखें दरवाजे पर टिकीं। हर आहट पर दिल धड़कता। कोई नर्स आई, बोली, “अरे माँ, चाय पी लो।” उसने मुस्कुराकर मना कर दिया। “नहीं बेटी, बेटा आ रहा है।”दिन ढला। शाम हुई। रात हुई। फिर सन्नाटा।

बेटा नहीं आया।उसके बाद कुछ भी वैसा नहीं रहा। वो फिर से उसी अंधेरे में चली गई, जहाँ से कभी निकली थी। दवाइयाँ बढ़ गईं। बातें कम हो गईं। बस एक ही शब्द बार-बार उसके होंठों पर आता—”कल… कल आएगा।”

कई साल बाद, एक सुबह उसकी साँसें थम गईं। रिनपास की उसी वार्ड में, उसी कुर्सी के पास, जहाँ वो आखिरी बार बेटे का इंतजार कर रही थी।मौत की सूचना परिजनों को मिली। किसी ने जवाब नहीं दिया। किसी ने फोन नहीं उठाया। आखिरकार शव को लेने कोई नहीं आया।

फिर डालसा की टीम आई। सचिव राकेश रोशन और पीएलवी भारती शाहदेव ने फोन किए, समझाया, मनाया। आखिरकार चचेरे भाई आए। शव उठाया। हरमू मुक्तिधाम में आग जलाई गई। धुआँ उठा। और उस धुएँ में शायद वो आखिरी बार बेटे का इंतजार कर रही थी।कहानी खत्म नहीं हुई।
क्योंकि आज भी कई माँ ऐसी हैं—अस्पतालों की उन कोनों में, घरों की उन कोठरियों में, जहाँ वो “कल” कभी नहीं आता।
और वो इंतजार… वो इंतजार कभी खत्म नहीं होता।

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