सरना हमारी पहचान और आत्मा”: आदिवासी समाज ने सरना धर्म कोड की मांग को लेकर आंदोलन तेज किया
सरना हमारी पहचान और आत्मा”: आदिवासी समाज ने सरना धर्म कोड की मांग को लेकर आंदोलन तेज किया
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!रांची, 15 दिसंबर : सरना धर्म कोड को जनगणना में अलग धार्मिक कोड के रूप में मान्यता देने की मांग को लेकर झारखंड के आदिवासी समाज ने एक बार फिर आंदोलन को तेज करने का ऐलान किया है। सोमवार को रांची के सिरमटोली स्थित सरना स्थल पर विभिन्न आदिवासी संगठनों की महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें सर्वसम्मति से दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़े धरने का निर्णय लिया गया।बैठक में तय किया गया कि 17 फरवरी को झारखंड से हजारों की संख्या में आदिवासी दिल्ली कूच करेंगे और केंद्र सरकार से सरना धर्म कोड की मान्यता की मांग को बुलंद आवाज में उठाएंगे।
सरना धर्म कोड:पहचान और अस्तित्व की लड़ाई
बैठक में वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि सरना धर्म कोड केवल एक मांग नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, अस्तित्व और आत्मा है। टीएसी सदस्य नारायण उरांव ने कहा, “आजादी से पहले आदिवासी समाज का अलग धर्म कोड था, जिसे बाद में हटा दिया गया। देश के सभी समुदायों को धर्म कोड मिला है, लेकिन आदिवासियों को इससे वंचित रखा गया है। अब 33 जनजातियां एकजुट होकर सरना कोड की मांग कर रही हैं।”उन्होंने चेतावनी दी कि 2026-27 की जनगणना से पहले अगर अलग कोड नहीं दिया गया, तो आदिवासियों को अन्य धर्मों में गिना जाना ऐतिहासिक अन्याय होगा।सामाजिक कार्यकर्ता शिवा कच्छप ने केंद्र सरकार पर आदिवासियों के साथ छल करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “अगर 2026 जनगणना में सरना कॉलम नहीं जोड़ा गया, तो ‘कॉलम नहीं तो वोट नहीं’ आंदोलन शुरू होगा। धर्म कोड न होने से हम राजनीतिक रूप से कमजोर हो रहे हैं। हम देश की तीसरी सबसे बड़ी आबादी हैं, फिर भी अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं।” उन्होंने बताया कि इस मांग के चलते समाज में धर्म वापसी की प्रक्रिया भी तेज हुई है।
बैठक में प्रमुख चेहरे मौजूदबैठक में विश्वंभर कुमार भगत, शिवा कच्छप, संजय कुजुर, रविशन टुडु, रायमुनी किस्पोट्टा, राहुल तिर्की, सीता कच्छप सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता और सरना धर्मावलंबी शामिल हुए। सभी ने एक स्वर में केंद्र सरकार से मांग की कि सरना को अलग धर्म कोड दिया जाए।यह आंदोलन लंबे समय से चला आ रहा है।
जाहिर है 2020 में झारखंड विधानसभा ने सरना कोड का प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन केंद्र ने अभी तक कोई फैसला नहीं लिया। 2025 में भी फरवरी और मई में बड़े प्रदर्शन हुए थे। आदिवासी संगठन जनगणना से पहले अपनी मांग मनवाने के लिए दबाव बना रहे हैं।सरना धर्म प्रकृति पूजक आदिवासियों की प्राचीन परंपरा है, जिसमें जल, जंगल और जमीन की पूजा की जाती है। अनुयायी खुद को हिंदू या अन्य धर्मों से अलग मानते हैं।यह आंदोलन आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक संरक्षण की लड़ाई का प्रतीक बन चुका है।

















