जिंदगी के इस इस उम्र में बने मिसाल: 80 की उम्र में आंखों से बेबस, 90 में सड़कों पर पसीना; फिर भी डिगे नहीं हौसले!

अक्सर लोग 60-65 की उम्र में काम से सेवानिवृत्ति (Retirement) और आराम की जिंदगी की कल्पना करने लगते हैं। लेकिन समाज में कुछ ऐसे ‘अजेय योद्धा’ भी हैं, जिनके लिए उम्र सिर्फ एक संख्या है और संघर्ष ही जीवन जीने का नाम। आज हम आपको दो ऐसी हस्तियों से मिलवा रहे हैं, जिनकी कहानी पढ़कर न केवल आपकी आंखें नम होंगी, बल्कि आपको जीवन में आगे बढ़ने का नया नजरिया भी मिलेगा।
धनबाद की टूसिया मोहली: अंधेरे में भी उम्मीद की लौ
धनबाद जिले के बलियापुर थाना क्षेत्र की बेलगढ़िया मोहली बस्ती में रहने वाली 80 वर्षीय टूसिया मोहली उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं, जो छोटी-छोटी समस्याओं में हार मान लेते हैं। आंखों की रोशनी पूरी तरह खो चुकी टूसिया देवी ने कभी हिम्मत नहीं हारी।
हुनर: टूसिया देवी वर्षों से बांस से सूप, टोकरी, सुप्ती और पंखे जैसी घरेलू सामग्री बना रही हैं।
संघर्ष: बिना आंखों के, सिर्फ स्पर्श के सहारे बांस को बारीक तरीके से छीलना और उसे आकार देना उनकी अद्भुत कलाकारी को दर्शाता है।
स्वाभिमान: वह अपनी मेहनत की कमाई पर जीती हैं। किसी परिजन के सहारे ऑटो स्टैंड तक जाना और फिर झरिया बाजार जाकर अपना सामान बेचना उनके अटूट संकल्प को बयां करता है।
2. कोलकाता के गेवल साव: 90 साल और गोलगप्पे की रेहड़ी
दूसरी कहानी कोलकाता की गलियों से है, जहाँ 90 वर्षीय गेवल साव अपनी उम्र को चुनौती दे रहे हैं। जहां लोग इस उम्र में सहारे की तलाश में होते हैं, वहां गेवल साव हर दिन सुबह 4 बजे उठकर अपनी पत्नी के साथ पेट भरने के लिए गोलगप्पे बनाते हैं।
मेहनत: बुढ़ापे के कारण शरीर साथ नहीं देता, फिर भी उनके हौसले में कोई कमी नहीं है।
आत्मसम्मान: गेवल साव का संघर्ष यह साबित करता है कि मेहनत से कमाया हुआ हर पैसा किसी भी दान से बड़ा और सम्मानित होता है।
हमारा नजरिया: समाज का क्या दायित्व है?
टूसिया मोहली और गेवल साव जैसे लोग समाज की वो नींव हैं, जिन्होंने कभी अपनी स्थिति का रोना नहीं रोया। क्या ऐसे मेहनतकश लोगों तक सरकारी योजनाओं का लाभ सही ढंग से पहुंच रहा है? क्या सामाजिक संस्थाएं इनके हुनर को व्यापक बाजार देने के लिए आगे आ सकती हैं?
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