Deoghar Sadar Hospital

जीवन बचाने वाले ही अगर ये करें तो जान खतरे में है, देवघर सदर अस्पताल का यह सच शर्मनाक है

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Deoghar Sadar Hospital

देवघर: अस्पताल को ‘दूसरा मंदिर’ माना जाता है, जहाँ लोग अपनी आखिरी उम्मीद लेकर जाते हैं। लेकिन जब उसी मंदिर के पुजारी (स्वास्थ्यकर्मी) जानलेवा लापरवाही बरतने लगें, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। देवघर सदर अस्पताल में एक घायल युवक को एक्सपायरी स्लाइन चढ़ाने की घटना महज एक ‘गलती’ नहीं, बल्कि एक आपराधिक लापरवाही है।

जानकारी के अनुसार, बैजनाथपुर निवासी कृष कुमार अपने एक मित्र के साथ बाइक से बिलासी चौक की ओर जा रहा था। इसी दौरान एक तेज रफ्तार वाहन ने उसकी बाइक को टक्कर मार दी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। स्थानीय लोगों की सहायता से उसे इलाज के लिए देवघर सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया।

घायल युवक की मां टुम्पा देवी ने आरोप लगाया कि इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराने के बाद प्राथमिक उपचार और ड्रेसिंग के लिए उनसे पैसे मांगे गए। उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों को बताया कि वे जल्दबाजी में घर से बिना पैसे लिए निकल आई हैं, लेकिन इसके बावजूद इलाज शुरू नहीं किया गया। परिजनों का कहना है कि बेटे की हालत बिगड़ती देख उन्हें अपना मोबाइल फोन गिरवी रखना पड़ा, जिसके बाद उपचार शुरू किया गया।

परिजनों ने यह भी आरोप लगाया कि इलाज के दौरान युवक को जो स्लाइन चढ़ाई गई, उसकी एक्सपायरी अवधि समाप्त हो चुकी थी। उनके अनुसार संबंधित स्लाइन का निर्माण फरवरी 2024 में हुआ था तथा उसकी एक्सपायरी जनवरी 2026 में हो चुकी थी। इसके बावजूद 19 जून 2026 को वही स्लाइन मरीज को लगा दी गई। हालांकि मरीज की स्थिति अभी सामान्य है।

व्यवस्था में कहां है छेद?

इस घटना ने स्वास्थ्य प्रणाली के तीन बड़े चेहरों को बेनकाब कर दिया है:
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: एक तरफ सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज का दावा किया जाता है, वहीं दूसरी ओर परिजनों का मोबाइल गिरवी रखवाना यह साबित करता है कि अस्पताल में ‘मजबूरी का व्यापार’ चल रहा है।

दवा वितरण प्रणाली पर सवाल: एक्सपायरी स्लाइन मरीज तक पहुँचना यह दर्शाता है कि स्टॉक ऑडिट और दवा भंडारण की प्रक्रिया में भारी गड़बड़ी है। क्या किसी ने यह नहीं देखा कि दवा की मियाद कब खत्म हो रही थी?

जवाबदेही का अभाव: अक्सर ऐसी घटनाओं में ‘जांच कमेटी’ का गठन कर दिया जाता है, जो समय के साथ ठंडे बस्ते में चली जाती है। क्या जांच से बड़ा मरीज की जान का जोखिम नहीं है?

सिर्फ कार्रवाई काफी नहीं, सुधार जरूरी है

सिविल सर्जन द्वारा जांच का आश्वासन देना एक औपचारिक प्रक्रिया है, लेकिन जनता को अब ठोस बदलावचाहिए:

1. डिजिटल स्टॉक ट्रैकिंग: सभी सरकारी अस्पतालों में एक्सपायरी दवाइयों को रोकने के लिए ‘डिजिटल इन्वेंट्री सिस्टम’ अनिवार्य हो, जो एक्सपायरी से 3 महीने पहले ही अलर्ट जारी करे।
2. जीरो-टॉलरेंस पॉलिसी: इलाज के नाम पर पैसे मांगने वाले स्टाफ के खिलाफ तुरंत FIR दर्ज होनी चाहिए, ताकि यह एक नजीर बने।
3. मरीज सुरक्षा ऑडिट: जिले के हर स्वास्थ्य केंद्र में औचक निरीक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए, न कि शिकायत के बाद की कार्रवाई।

देवघर की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के पास ‘मशीनें’ तो हैं, लेकिन ‘इंसानियत’ की कमी खल रही है। अगर समय रहते दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो अस्पताल में भर्ती होने का खौफ किसी भी दुर्घटना से बड़ा हो जाएगा।

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