रांची : लाल गलियारे का ढलता सूरज, गिरफ्तारी, सरेंडर और सुरक्षा बलों की निर्णायक बढ़त

रांची। झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चल रहा सुरक्षा बलों का अभियान अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। राज्य पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की संयुक्त कार्रवाई में 22 लाख रुपये के तीन इनामी हार्डकोर माओवादी गिरफ्तार किए गए हैं। इनमें 15 लाख रुपये का इनामी रीजनल कमेटी सदस्य मदन महतो, 5 लाख रुपये का इनामी सब-जोनल कमांडर रवि सरदार और 2 लाख रुपये की इनामी महिला नक्सली मीना पहाड़िया शामिल हैं। कार्रवाई के दौरान तीन AK-47 राइफलें, भारी मात्रा में गोला-बारूद और नक्सली साहित्य भी बरामद किया गया।

यह सफलता लंबे समय तक जुटाई गई सटीक खुफिया जानकारी और लगातार चलाए जा रहे विशेष अभियानों का परिणाम मानी जा रही है। गिरफ्तार तीनों माओवादी वर्षों से झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों में सक्रिय थे। उन पर सुरक्षा बलों पर हमले, आईईडी विस्फोट, लेवी वसूली, हत्या, हथियारबंद मुठभेड़ और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने जैसे कई गंभीर आरोप हैं।

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, मदन महतो के खिलाफ 35, रवि सरदार के खिलाफ 42 और मीना पहाड़िया के खिलाफ दो आपराधिक मामले दर्ज हैं। तीनों लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की मोस्ट वांटेड सूची में शामिल थे। जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि पूछताछ से माओवादी संगठन के सक्रिय दस्तों, हथियारों के ठिकानों, लेवी नेटवर्क, फंडिंग चैनलों, नए भर्ती अभियान और शीर्ष कमांडरों की गतिविधियों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती हैं, जिनके आधार पर आगे और बड़े अभियान चलाए जाएंगे।

लगातार कमजोर हो रहा माओवादी नेटवर्क
बीते कुछ महीनों में सुरक्षा बलों ने माओवादी संगठन को लगातार बड़े झटके दिए हैं। एक करोड़ रुपये के इनामी मिसिर बेसरा, शीर्ष कमांडर रविंद्र गंजू और अजय महतो सहित कई बड़े माओवादी नेताओं की गिरफ्तारी तथा 24 नक्सलियों के आत्मसमर्पण ने संगठन की ताकत को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। लगातार गिरफ्तारियों, सरेंडर और हथियारों की बरामदगी से स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि लाल गलियारे में माओवादियों की पकड़ पहले जैसी नहीं रही।

पूरी तरह खत्म नहीं, लेकिन निर्णायक दबाव
हालांकि झारखंड को अभी आधिकारिक रूप से नक्सलवाद मुक्त घोषित नहीं किया गया है, लेकिन हालिया घटनाक्रम यह जरूर दर्शाते हैं कि सुरक्षा बलों का दबाव लगातार बढ़ा है और माओवादी संगठन का नेटवर्क पहले की तुलना में काफी कमजोर हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह खुफिया आधारित अभियान, विकास कार्य और आत्मसमर्पण नीति समानांतर रूप से जारी रही, तो राज्य में नक्सलवाद को और सीमित किया जा सकता है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष सुरक्षा अभियानों के भविष्य के परिणामों और आधिकारिक आकलन पर निर्भर करेगा।





















