भारतीय रेडियो प्रसारण का शताब्दी वर्ष: आवाज से जनसंवाद तक रेडियो की 100 साल की यात्रा

डॉ. सुरेश वर्मा की कलम से 
रेडियो का नाम सुनते ही कई लोगों के मन में पुराना रेडियो सेट, उसका घूमता हुआ डायल, उसमें से आती आवाज और परिवार के साथ बैठकर कार्यक्रम सुनने की यादें ताजा हो जाती हैं। वह दौर जब मनोरंजन के साधन सीमित थे और रेडियो घर का एक महत्वपूर्ण सदस्य हुआ करता था। समाचार हो, संगीत हो, क्रिकेट की कमेंट्री हो या किसी महत्वपूर्ण घटना का सीधा प्रसारण—रेडियो ने कई पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित किया है।
रेडियो की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह केवल आवाज सुनाता नहीं, बल्कि श्रोता के मन में तस्वीरें बनाता है। मधुर संगीत, शब्दों, आवाज, ध्वनि-प्रभाव और कभी-कभी मौन के माध्यम से रेडियो श्रोता को कल्पना की एक ऐसी दुनिया में ले जाता है, जिसे वह स्वयं अपने मन में रचता है।
रेडियो केवल सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा। जीवन के कठिन समय में इसने लोगों को साहस, भरोसा और उम्मीद भी दी है। अकेलेपन को दूर करने से लेकर किसी आपदा के समय महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचाने तक रेडियो ने समाज में अपनी उपयोगिता बार-बार साबित की है।
जिज्ञासु व्यक्ति के लिए रेडियो नए सवाल पैदा करता है। रचनात्मक प्रतिभाओं के लिए यह अभिव्यक्ति का मंच है। प्रसारण और संवाद की कला सीखने वालों के लिए यह एक प्रयोगशाला है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता और पहुंच है। रेडियो कम लागत में समाज के बड़े वर्ग तक पहुंच सकता है।
रेडियो की शक्ति
आज विकसित और विकासशील दोनों देशों में रेडियो का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। यह मनोरंजन के साथ-साथ संस्कृति का संवाहक और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षक भी है।
रेडियो ने लोकगीतों, लोककलाओं, पारंपरिक संगीत और क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों को लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कई ऐसी लोक परंपराएं हैं जिन्हें रेडियो के माध्यम से व्यापक पहचान मिली।
रेडियो के विकास के पीछे कई महान वैज्ञानिकों के अनुसंधान जुड़े हैं। हर्ट्ज, मैक्सवेल, फैराडे और मार्कोनी जैसे वैज्ञानिकों के प्रयोगों ने वायरलेस संचार की वैज्ञानिक नींव तैयार की। रेडियो तरंगों ने समुद्र में जहाजों को संपर्क स्थापित करने में मदद की और युद्ध के समय संदेश पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनीं।

आज भी रेडियो तरंगें आधुनिक संचार व्यवस्था की रीढ़ हैं। पुलिस के वायरलेस सेट, टेलीविजन प्रसारण, डीटीएच सेवाएं, रिमोट कंट्रोल, वाई-फाई, ब्लूटूथ, वायरलेस उपकरण, उपग्रह संचार और अनेक तकनीकी प्रणालियां रेडियो फ्रीक्वेंसी पर आधारित हैं।
इस तरह रेडियो का महत्व केवल रेडियो सेट तक सीमित नहीं है। आधुनिक वायरलेस दुनिया के पीछे भी रेडियो तरंगों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत
विश्व में संगठित रेडियो प्रसारण के विकास के बाद भारत में भी रेडियो प्रसारण की शुरुआत हुई। 23 जुलाई 1927 को इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी ने बॉम्बे में रेडियो स्टेशन की शुरुआत की। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया।
इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी आर्थिक कठिनाइयों के कारण ज्यादा समय तक नहीं चल सकी। बाद में सरकार ने प्रसारण व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लिया।
8 जून 1936 को इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो (AIR) कर दिया गया। स्वतंत्रता के बाद 1956 में इसे ‘आकाशवाणी’ नाम दिया गया।
आज आकाशवाणी भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण तंत्रों में शामिल है।

गांधी जी और आकाशवाणी
12 नवंबर 1947 भारतीय रेडियो प्रसारण के इतिहास की महत्वपूर्ण तारीख है। महात्मा गांधी ने उस दिन ऑल इंडिया रेडियो के स्टूडियो से अपना पहला और अंतिम सजीव प्रसारण किया था।
महात्मा गांधी के सम्मान में 12 नवंबर को राष्ट्रीय लोक प्रसारण दिवस के रूप में याद किया जाता है। यह दिन भारतीय लोक सेवा प्रसारण की परंपरा और उसके सामाजिक दायित्व को भी रेखांकित करता है।
विविध भारती ने बदला मनोरंजन का अंदाज
3 अक्टूबर 1957 को आकाशवाणी ने ‘विविध भारती’ सेवा शुरू की। इसका उद्देश्य जनता को स्वस्थ और मनोरंजक कार्यक्रम उपलब्ध कराना था।
विविध भारती ने जल्द ही श्रोताओं के बीच अपनी अलग पहचान बना ली। संगीत और मनोरंजन के कार्यक्रमों ने इसे घर-घर तक पहुंचाया।
‘हवा महल’, ‘पिटारा’, ‘जयमाला’, ‘संगीत सरिता’, ‘भूले-बिसरे गीत’ और ‘चित्रलोक’ जैसे कार्यक्रमों की याद आज भी करोड़ों श्रोताओं के मन में मौजूद है।
विविध भारती की खासियत यह रही कि इसने बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर वर्ग को जोड़ा। रेडियो मनोरंजन के क्षेत्र में इसकी भूमिका लंबे समय तक बेहद महत्वपूर्ण रही।
एफएम तकनीक का प्रवेश
23 जुलाई 1977 को भारतीय प्रसारण में पहली बार एफएम तकनीक का इस्तेमाल किया गया। पहला एफएम प्रसारण मद्रास से हुआ।
एफएम तकनीक ने रेडियो की आवाज को बेहतर गुणवत्ता प्रदान की और बाद में एफएम रेडियो ने भारत के शहरी जीवन में विशेष लोकप्रियता हासिल की।
एफएम तकनीक के आविष्कार का श्रेय अमेरिकी अभियंता एडविन आर्मस्ट्रांग को दिया जाता है, जिन्होंने 1933 में एफएम प्रसारण की तकनीक विकसित की थी।
स्थानीय रेडियो से विकास का संदेश
30 अक्टूबर 1984 को भारत में विकासात्मक संचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। तमिलनाडु के नागरकोइल से पहला स्थानीय रेडियो स्टेशन शुरू हुआ।
स्थानीय रेडियो का उद्देश्य छोटे क्षेत्र में रहने वाले लोगों तक उनकी जरूरत से जुड़ी जानकारी पहुंचाना था। कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, स्थानीय समस्याओं और विकास योजनाओं से जुड़े कार्यक्रम इसके माध्यम से प्रसारित किए गए।
स्थानीय रेडियो की प्रोग्रामिंग अपेक्षाकृत लचीली होती है और इसमें स्थानीय भाषा तथा स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी जाती है।
सैटेलाइट से जुड़ा आकाशवाणी का नेटवर्क
1985 में आकाशवाणी को सैटेलाइट और इनसैट प्रणाली से जोड़ना भारतीय प्रसारण के विकास में महत्वपूर्ण कदम था। इससे प्रसारण की गति और गुणवत्ता में सुधार हुआ।
बाद में डीटीएच और डिजिटल माध्यमों के विस्तार के साथ आकाशवाणी की पहुंच देश की सीमाओं से आगे भी बढ़ी।
फोन-इन कार्यक्रम ने श्रोता को बनाया सहभागी
10 जनवरी 1993 रेडियो के इतिहास में एक नए दौर की शुरुआत का समय माना गया। फोन-इन कार्यक्रमों के जरिए श्रोताओं को सीधे स्टूडियो से जुड़ने का अवसर मिलने लगा।
पहले श्रोता पत्र लिखकर अपनी बात रेडियो तक पहुंचाते थे। फोन-इन कार्यक्रमों ने इस व्यवस्था को बदल दिया। अब श्रोता कार्यक्रम के दौरान सीधे प्रस्तोता से बातचीत कर सकते थे।
डॉक्टरों, विशेषज्ञों और अधिकारियों से सीधे सवाल पूछने की सुविधा ने रेडियो को एकतरफा संचार से आगे बढ़ाकर संवाद का माध्यम बना दिया।
प्रसार भारती का गठन
23 नवंबर 1997 को प्रसार भारती अस्तित्व में आया। इसके साथ आकाशवाणी और दूरदर्शन को लोक सेवा प्रसारण व्यवस्था के अंतर्गत नई संस्थागत संरचना मिली।
प्रसार भारती का उद्देश्य सार्वजनिक सेवा प्रसारण को मजबूत करना और देश के नागरिकों तक सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाना है।
निजी एफएम रेडियो का दौर
1990 के दशक में भारत में निजी एफएम रेडियो के लिए रास्ता खुलना शुरू हुआ। 1993 में कुछ शहरों में निजी ऑपरेटरों के माध्यम से एफएम प्रसारण का प्रयोग किया गया।
इसके बाद निजी एफएम क्षेत्र का विस्तार हुआ। 3 जुलाई 2001 को बेंगलुरु में रेडियो सिटी के साथ भारत के निजी एफएम रेडियो क्षेत्र ने एक नया दौर शुरू किया।
निजी एफएम चैनलों ने संगीत, मनोरंजन, स्थानीय समाचार, युवा कार्यक्रमों और फोन-इन शो के जरिए रेडियो को नई पीढ़ी से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सामुदायिक रेडियो ने दी स्थानीय आवाज
1 फरवरी 2004 को भारत में सामुदायिक रेडियो के लिए एक नया अध्याय शुरू हुआ। चेन्नई के अन्ना विश्वविद्यालय से सामुदायिक रेडियो की शुरुआत हुई।
बाद में शैक्षणिक संस्थानों के साथ गैर-सरकारी संगठनों और कृषि विकास से जुड़े संस्थानों को भी सामुदायिक रेडियो चलाने के अवसर मिले।
सामुदायिक रेडियो का मूल विचार है—समुदाय का, समुदाय द्वारा और समुदाय के लिए प्रसारण।
यह स्थानीय लोगों को अपनी समस्याएं, अनुभव और जरूरतें सामने रखने का मंच देता है। स्थानीय भाषा और बोली में कार्यक्रम होने के कारण इसका प्रभाव भी अधिक होता है।
‘मन की बात’ और रेडियो की नई पहचान
3 अक्टूबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ की शुरुआत हुई। कार्यक्रम ने रेडियो को डिजिटल युग में एक नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह कार्यक्रम आकाशवाणी के विभिन्न चैनलों के साथ-साथ दूरदर्शन और बाद में डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से भी व्यापक रूप से पहुंचा।
‘मन की बात’ में स्वच्छता, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण, ग्रामीण विकास, सामाजिक सुधार, स्थानीय उपलब्धियों और राष्ट्र निर्माण जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई।
27 जनवरी 2015 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी ‘मन की बात’ के एक विशेष प्रसारण में भाग लिया। इससे इस कार्यक्रम की अंतरराष्ट्रीय चर्चा हुई।
‘मन की बात’ से ‘जन की बात’ तक
‘मन की बात’ को केवल एक रेडियो कार्यक्रम के रूप में देखने के बजाय विकासात्मक संचार के एक प्रयोग के रूप में भी देखा जा सकता है।
इस कार्यक्रम की शैली में सामान्य लोगों की उपलब्धियों, स्थानीय नवाचारों और सामाजिक पहलों को सामने लाने का प्रयास दिखाई देता है। इससे श्रोताओं को यह संदेश मिलता है कि परिवर्तन केवल सरकार या बड़ी संस्थाओं के स्तर पर नहीं, बल्कि सामान्य नागरिकों के प्रयासों से भी संभव है।
रेडियो की खासियत यह है कि वह एक साथ करोड़ों लोगों तक पहुंचते हुए भी प्रत्येक श्रोता से व्यक्तिगत संवाद जैसा अनुभव पैदा कर सकता है।
यही रेडियो की असली ताकत है।
रेडियो और ग्रामीण विकास
भारत जैसे देश में ग्रामीण विकास के क्षेत्र में रेडियो की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
कृषि प्रधान समाज में किसानों को मौसम, बीज, बुवाई, सिंचाई, फसल सुरक्षा, मृदा संरक्षण, पशुपालन, कृषि बाजार और सरकारी योजनाओं की जानकारी उनकी भाषा में उपलब्ध कराना जरूरी है।
रेडियो यह काम सरल भाषा में कर सकता है। जिन लोगों तक इंटरनेट या स्मार्टफोन की पहुंच सीमित है, वहां रेडियो आज भी महत्वपूर्ण माध्यम है।
कृषि कार्यक्रमों के जरिए किसानों को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों की जानकारी दी जा सकती है। पशुपालन से जुड़े कार्यक्रम पशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, दुग्ध उत्पादन और पशु रोगों से बचाव के उपाय बताते हैं।
इस तरह रेडियो वैज्ञानिक अनुसंधान और ग्रामीण समाज के बीच एक सेतु का काम करता है।
रेडियो बना गांव की आधुनिक चौपाल
रेडियो को ग्रामीण समाज की आधुनिक चौपाल कहा जा सकता है।
चौपाल में लोग बैठकर अपने गांव की समस्याओं पर चर्चा करते थे। रेडियो ने इस संवाद को व्यापक बना दिया। अब कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सरकारी योजनाओं और सामाजिक मुद्दों पर विशेषज्ञों और ग्रामीणों के बीच संवाद संभव है।
फोन-इन और सामुदायिक रेडियो ने इस संवाद को और मजबूत किया है।
रेडियो ग्रामीण नागरिकों को केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि उन्हें अपनी राय रखने और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी के लिए भी प्रेरित करता है।
स्थानीय भाषा और बोलियों के संरक्षण में भूमिका
भारत भाषाई और सांस्कृतिक विविधता वाला देश है। अनेक स्थानीय भाषाएं और बोलियां ऐसी हैं जिनका उपयोग सीमित क्षेत्रों में होता है।
रेडियो स्थानीय भाषाओं और बोलियों में कार्यक्रम प्रसारित करके इस विविधता को संरक्षित करने में योगदान देता है।
लोकगीत, लोककथा, पारंपरिक संगीत और स्थानीय इतिहास के कार्यक्रम आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक दस्तावेज का काम करते हैं।
रेडियो का बदलता स्वरूप
रेडियो ने पिछले सौ वर्षों में कई तकनीकी बदलाव देखे हैं।
एक समय बड़े वाल्व वाले रेडियो घरों की पहचान हुआ करते थे। फिर सॉलिड-स्टेट रेडियो आए। इसके बाद ट्रांजिस्टर ने रेडियो को पोर्टेबल बना दिया।
ट्रांजिस्टर के कारण रेडियो घर की चारदीवारी से निकलकर खेत, सड़क, बाजार और यात्रा तक पहुंच गया।
फिर वॉकमैन और छोटे पोर्टेबल उपकरण आए। आज मोबाइल फोन, इंटरनेट और विभिन्न डिजिटल एप्लिकेशन के माध्यम से रेडियो दुनिया के किसी भी हिस्से में सुना जा सकता है।
अर्थात रेडियो का उपकरण बदलता रहा, लेकिन रेडियो की मूल शक्ति—मानवीय आवाज और संवाद—आज भी कायम है।
रेडियो और डिजिटल युग
डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया, वीडियो प्लेटफॉर्म और स्मार्टफोन के विस्तार के बावजूद रेडियो का महत्व खत्म नहीं हुआ।
बल्कि रेडियो ने खुद को डिजिटल माध्यमों के अनुरूप ढाल लिया है।
आज रेडियो कार्यक्रम एफएम, डीटीएच, वेबसाइट, मोबाइल एप, पॉडकास्ट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के माध्यम से श्रोताओं तक पहुंच रहे हैं।
अब श्रोता किसी कार्यक्रम को केवल निर्धारित समय पर सुनने के लिए बाध्य नहीं है। डिजिटल माध्यमों के कारण वह अपनी सुविधा के अनुसार कार्यक्रम सुन सकता है।
इस परिवर्तन ने रेडियो को पारंपरिक माध्यम से डिजिटल ऑडियो माध्यम में बदल दिया है।
आकाशवाणी का विशाल नेटवर्क
आकाशवाणी भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण संगठनों में से एक है। इसके व्यापक नेटवर्क के माध्यम से देश के विभिन्न हिस्सों में समाचार, संगीत, शिक्षा, संस्कृति, कृषि और विकास से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं।
आकाशवाणी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भाषाई विविधता है। विभिन्न भारतीय भाषाओं और बोलियों में कार्यक्रमों ने इसे देश के अलग-अलग क्षेत्रों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
विदेश प्रसारण सेवा के माध्यम से भी भारत की संस्कृति, विचार और गतिविधियों को दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाया जाता है।
आकाशवाणी का ध्वनि अभिलेखागार भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसमें साहित्यकारों, कलाकारों, संगीतकारों, नेताओं और विभिन्न क्षेत्रों की महत्वपूर्ण हस्तियों की आवाजें संरक्षित हैं।
रेडियो केवल ध्वनि नहीं, कल्पना की दुनिया है
रेडियो की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें दृश्य नहीं होते। इसलिए श्रोता अपने मन में दृश्य बनाता है।
जब कोई उद्घोषक बारिश का वर्णन करता है, तो श्रोता के मन में बारिश का अपना दृश्य बनता है। जब कोई कहानी सुनाई जाती है, तो पात्रों और घटनाओं की तस्वीर श्रोता की कल्पना में बनती है।
यही कारण है कि रेडियो की कल्पना शक्ति कई बार दृश्य माध्यमों से भी अधिक व्यक्तिगत और प्रभावशाली हो जाती है।
मानवीय आवाज में भावनाओं को सीधे श्रोता तक पहुंचाने की अद्भुत क्षमता होती है।
रेडियो का सामाजिक दायित्व
रेडियो का वास्तविक उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है। भारतीय सार्वजनिक प्रसारण की मूल भावना ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ से जुड़ी रही है।
सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के साथ सामाजिक जागरूकता, राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक संरक्षण और लोकतांत्रिक संवाद को बढ़ावा देना रेडियो की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल रहा है।
आपदा के समय मौसम और सुरक्षा संबंधी जानकारी देना, स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता फैलाना, किसानों को कृषि संबंधी जानकारी देना और सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाना—ये सभी रेडियो के सामाजिक दायित्व का हिस्सा हैं।
रेडियो और लोकतंत्र
रेडियो लोकतांत्रिक संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र में नागरिकों की आवाज सुनना, उनके विचारों को महत्व देना और समाज में संवाद कायम रखना भी जरूरी है।
फोन-इन कार्यक्रम, सामुदायिक रेडियो और स्थानीय प्रसारण लोगों को अपनी बात रखने का अवसर देते हैं।
इस अर्थ में रेडियो केवल सूचना देने वाला माध्यम नहीं, बल्कि संवाद और सहभागिता का मंच भी है।
रेडियो के सफर के 12 महत्वपूर्ण पड़ाव
23 जुलाई 1927: बॉम्बे में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी के रेडियो स्टेशन का उद्घाटन।
8 जून 1936: इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो किया गया।
12 नवंबर 1947: महात्मा गांधी ने आकाशवाणी के स्टूडियो से अपना पहला और अंतिम सजीव प्रसारण किया।
3 अक्टूबर 1957: विविध भारती सेवा की शुरुआत हुई।
23 जुलाई 1977: भारत में पहली बार एफएम प्रसारण तकनीक का प्रयोग किया गया।
30 अक्टूबर 1984: नागरकोइल से स्थानीय रेडियो सेवा की शुरुआत हुई।
1985: आकाशवाणी को सैटेलाइट इनसैट प्रणाली से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।
10 जनवरी 1993: फोन-इन कार्यक्रमों के जरिए श्रोताओं की सीधी भागीदारी का नया दौर शुरू हुआ।
23 नवंबर 1997: प्रसार भारती का गठन हुआ और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन को लोक सेवा प्रसारण की नई संस्थागत व्यवस्था मिली।
3 जुलाई 2001: बेंगलुरु में रेडियो सिटी के साथ निजी एफएम रेडियो के विस्तार का नया दौर शुरू हुआ।
1 फरवरी 2004: सामुदायिक रेडियो के क्षेत्र में नया अध्याय शुरू हुआ।
3 अक्टूबर 2014: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम की शुरुआत हुई।
शताब्दी वर्ष में रेडियो के सामने नई चुनौतियां
रेडियो की यात्रा गौरवशाली रही है, लेकिन भविष्य की राह आसान नहीं है।
डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग और पॉडकास्ट ने लोगों की मीडिया आदतों को तेजी से बदला है। युवा वर्ग के बीच पारंपरिक रेडियो की जगह डिजिटल ऑडियो प्लेटफॉर्म तेजी से ले रहे हैं।
ऐसे में रेडियो को अपनी सामग्री, प्रस्तुति और तकनीक में लगातार बदलाव करना होगा।
स्थानीय मुद्दों, युवाओं, रोजगार, शिक्षा, स्टार्टअप, कृषि, विज्ञान, महिला सशक्तीकरण और नई तकनीक से जुड़े कार्यक्रम रेडियो को नई पीढ़ी से जोड़ सकते हैं।
रेडियो को भविष्य में केवल प्रसारण माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि डिजिटल ऑडियो और संवाद मंच के रूप में विकसित करना होगा।
सौ साल बाद भी क्यों जरूरी है रेडियो?
रेडियो की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता है।
इसके लिए महंगा उपकरण जरूरी नहीं। बिजली या इंटरनेट की उपलब्धता सीमित होने पर भी रेडियो कई परिस्थितियों में काम कर सकता है। आप इसे खेत में काम करते हुए, गाड़ी चलाते हुए, दुकान पर बैठे हुए या घर के काम करते हुए सुन सकते हैं।
यह एक साथ करोड़ों लोगों तक पहुंचता है, लेकिन हर श्रोता को ऐसा लगता है कि आवाज सीधे उसी से बात कर रही है।
यही व्यक्तिगत जुड़ाव रेडियो को दूसरे माध्यमों से अलग बनाता है।
लेखक के बारे में ..
डॉ. सुरेश वर्मा देश के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में रेडियो विषय के वरिष्ठ एसोसिएट प्रोफेसर हैं। उन्हें रेडियो प्रसारण और मीडिया अध्यापन के क्षेत्र में 37 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने लगभग 15 वर्षों तक आकाशवाणी में कार्यक्रम अधिकारी के रूप में भी सेवाएं दी हैं।
















