Dhanbad: Ground caves in again in Jharia.

धनबाद : झरिया में फिर फटी जमीन, धुएं के गुब्बारे के साथ निकली आग की लपटें; 110 साल से जल रही धरती पर अब भी खतरा

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धनबाद में हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी नहीं थमी झरिया की आग, लोदना के बरारी छह नंबर में जोरदार धमाके के बाद भू-धंसान से दहशत

धनबाद। देश की सबसे बड़ी कोयला पट्टियों में शामिल झरिया एक बार फिर जमीन के नीचे सुलग रही आग और भू-धंसान के खतरे से सहम उठा। लोदना क्षेत्र के बरारी छह नंबर बस्ती में गुरुवार को अचानक जोरदार धमाके के साथ जमीन धंस गई। देखते ही देखते जमीन पर गहरी दरारें पड़ गईं और इन्हीं दरारों से काला जहरीला धुआं निकलने लगा। कुछ स्थानों पर आग की लपटें भी दिखाई दीं।

अचानक हुए इस भू-धंसान के बाद बस्ती में अफरा-तफरी मच गई। लोगों को जमीन के और धंसने तथा जहरीली गैस के फैलने का डर सताने लगा। सूचना मिलने पर बीसीसीएल की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति का जायजा लिया। प्रबंधन ने प्रभावित स्थान पर भराई कराने का आश्वासन दिया है।

हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल अचानक हुई एक घटना नहीं है। उनके मुताबिक इलाके में भूमिगत आग और पुराने खनन क्षेत्रों के कारण जमीन लंबे समय से अस्थिर है। स्थानीय लोगों ने अवैध कोयला खनन और कथित भूमिगत सुरंगों को भी भू-धंसान का कारण बताया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

RKDF
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1916 में लगी थी पहली आग, 110 साल बाद भी झरिया सुलग रहा

झरिया की जमीन के नीचे आग कोई नई समस्या नहीं है। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक 1916 में झरिया कोयला क्षेत्र में आग लगने की पहली घटना दर्ज की गई थी।

इसके बाद अलग-अलग खदानों में लगी आग धीरे-धीरे भूमिगत हिस्सों में फैलती गई। अवैज्ञानिक खनन, खदानों को खाली छोड़ देना और कोयले की परतों का ऑक्सीजन के संपर्क में आना इस समस्या को बढ़ाने वाले प्रमुख कारण रहे।

कोयले में ऑक्सीकरण की प्रक्रिया से पैदा होने वाली गर्मी कई बार स्वतः दहन का कारण बनती है। एक बार भूमिगत आग फैलने के बाद उसे नियंत्रित करना बेहद मुश्किल होता है।

यही कारण है कि झरिया में आज भी कई स्थानों पर जमीन के नीचे आग, धुआं और जहरीली गैसों का खतरा बना हुआ है।

कभी 18 वर्ग किमी तक पहुंचा था आग का क्षेत्र

झरिया की भूमिगत आग के दायरे को लेकर अलग-अलग सर्वेक्षणों में अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं।

1970 के दशक तक सरकारी रिकॉर्ड में आग प्रभावित क्षेत्र करीब 18 वर्ग किलोमीटर तक बताया गया था।

इसके बाद 2009 के झरिया मास्टर प्लान में 77 साइटों पर 17.32 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को आग प्रभावित बताया गया।

बाद के सर्वेक्षणों में आग प्रभावित साइटों और क्षेत्रफल में कमी दर्ज की गई। 2021 के सर्वे में 27 साइटों पर करीब 1.80 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र आग प्रभावित बताया गया।

लेकिन बाद के रिमोट सेंसिंग अध्ययनों में कुछ क्षेत्रों में आग की गतिविधि फिर बढ़ने के संकेत मिले। 2015 से 2025 के बीच किए गए अध्ययन में 2020 तक आग प्रभावित क्षेत्र करीब 14.4 वर्ग किलोमीटर और 2025 में लगभग 15 वर्ग किलोमीटर तक दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।

इन आंकड़ों में अंतर यह भी बताता है कि झरिया की भूमिगत आग की निगरानी और उसका आकलन कितना जटिल है।

3.7 करोड़ टन कोयला आग में जलने का अनुमान

झरिया कोयला क्षेत्र की आग का नुकसान सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है। यह देश के महत्वपूर्ण कोकिंग कोयला संसाधन को भी प्रभावित कर रही है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार झरिया की भूमिगत आग में अब तक करीब 3.7 करोड़ टन कोयला जलने का अनुमान है।

झरिया कोयला क्षेत्र में देश के सबसे महत्वपूर्ण कोकिंग कोयला भंडार मौजूद हैं। लेकिन आग, भू-धंसान और असुरक्षित भूमिगत क्षेत्रों के कारण यहां मौजूद कोयले के एक हिस्से का सुरक्षित और आर्थिक तरीके से खनन मुश्किल हो गया है।

यानी जमीन के नीचे सिर्फ आग नहीं जल रही, बल्कि उसके साथ देश का महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन भी नष्ट हो रहा है।

हजारों करोड़ रुपये खर्च, फिर भी खतरा खत्म नहीं

झरिया की आग पर नियंत्रण और प्रभावित आबादी के पुनर्वास के लिए केंद्र और कोयला क्षेत्र की एजेंसियों की ओर से लंबे समय से योजनाएं चलाई जा रही हैं।

जून 2025 में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने संशोधित झरिया मास्टर प्लान को मंजूरी दी थी। इसमें 5,940.47 करोड़ के वित्तीय प्रावधान की बात कही गई है।

इस राशि का इस्तेमाल आग नियंत्रण, भूमिगत क्षेत्रों की भराई, जल निकासी, पुनर्वास और अन्य संबंधित कार्यों के लिए किया जाना है।

इसके पहले भी झरिया में आग पर नियंत्रण और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास पर बड़ी रकम खर्च की जा चुकी है।

लेकिन बरारी छह नंबर जैसी घटनाएं बताती हैं कि जमीन के नीचे की समस्या अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

आग के ऊपर बसी आबादी

झरिया की सबसे गंभीर समस्या सिर्फ भूमिगत आग नहीं है। उससे भी बड़ा सवाल उन लोगों की सुरक्षा का है जो आग और भू-धंसान वाले इलाकों के आसपास रह रहे हैं।

2009 में झरिया पुनर्वास योजना के तहत आग और भू-धंसान प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

कई परिवारों को अलग-अलग चरणों में स्थानांतरित किया गया है। लेकिन अभी भी बड़ी आबादी ऐसे क्षेत्रों में रह रही है जहां जमीन के नीचे पुराने खनन क्षेत्र और आग का खतरा मौजूद है।

पुनर्वास में सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ घर देना नहीं है। लोगों को रोजगार, स्कूल, अस्पताल, सड़क, परिवहन और दूसरी बुनियादी सुविधाएं भी चाहिए। यही वजह है कि झरिया का पुनर्वास वर्षों से जटिल मुद्दा बना हुआ है।

बारिश के बीच बढ़ा भू-धंसान का खतरा

गुरुवार की घटना के समय क्षेत्र में बारिश भी हो रही थी। लगातार बारिश के दौरान पुराने खनन क्षेत्रों और फायर एरिया में जमीन की स्थिरता को लेकर चिंता बढ़ जाती है।

बरारी छह नंबर में जमीन धंसने के बाद लोगों ने मांग की है कि सिर्फ ऊपर से मिट्टी डालकर गड्ढे को बंद करने के बजाय भूमिगत हिस्से की वैज्ञानिक जांच कराई जाए।

लोगों का कहना है कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि जमीन के नीचे कितनी गहराई में पुरानी सुरंगें हैं, आग किस हिस्से में है और गैस का रिसाव कहां-कहां हो रहा है।

लक्ष्मी कॉलोनी की सड़क पर भी खतरा

ताजा घटना के बाद स्थानीय लोगों ने लक्ष्मी कॉलोनी को जोड़ने वाली मुख्य सड़क की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई है।

अगर भू-धंसान का दायरा बढ़ता है तो सड़क और आसपास की बस्तियां भी इसकी चपेट में आ सकती हैं। ऐसे में स्थानीय लोगों की मांग है कि संवेदनशील इलाकों की नियमित निगरानी की जाए और खतरे वाले हिस्सों को चिन्हित कर तत्काल सुरक्षा उपाय किए जाएं।

स्थानीय लोगों ने लगाया अवैध खनन का आरोप

घटना के बाद स्थानीय नेता सबूर गोराई ने क्षेत्र में अवैध कोयला खनन और कथित भूमिगत सुरंगों को भू-धंसान के लिए जिम्मेदार बताया। उन्होंने बीसीसीएल प्रबंधन पर भी लापरवाही का आरोप लगाया।

वहीं, सूचना मिलने के बाद बीसीसीएल की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति का निरीक्षण किया। प्रबंधन की ओर से प्रभावित हिस्से में भराई कराने का आश्वासन दिया गया है।

हालांकि, स्थानीय लोगों की मांग है कि तत्काल भराई के साथ-साथ पूरे इलाके का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा होने से पहले खतरे का पता लगाया जा सके।

सवाल सिर्फ एक गड्ढे का नहीं, पूरी बस्ती की सुरक्षा का है

बरारी छह नंबर में जमीन धंसने की घटना ने एक बार फिर झरिया की उस पुरानी समस्या को सामने ला दिया है, जिसे खत्म करने के लिए दशकों से योजनाएं बन रही हैं और हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं।

1916 में शुरू हुई आग आज 110 साल बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

जमीन के नीचे आग है, ऊपर बस्तियां हैं और बीच में खड़ा है भू-धंसान का खतरा। ऐसे में गुरुवार की घटना को सिर्फ एक स्थानीय हादसा मानकर छोड़ना आसान हो सकता है, लेकिन झरिया के लिए यह एक और चेतावनी है।

अब सवाल यह है कि झरिया की धरती को आग से कब पूरी तरह मुक्ति मिलेगी और आग के ऊपर रह रहे लोगों को स्थायी सुरक्षा कब मिलेगी?

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Drishti Now Desk

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