13 साल तक सर्जरी का इंतजार, फिर AIIMS में तन्वी की मौत: 2014 में ऑपरेशन की सलाह, बाद में बताया गया ‘सर्जरी संभव नहीं’; अब जांच कमेटी करेगी पूरे मामले की पड़ताल
कोटा की 15 वर्षीय तन्वी परियानी ने 1 सितंबर की सुबह दिल्ली AIIMS में दम तोड़ दिया। जन्मजात दिल की गंभीर बीमारी से जूझ रही तन्वी दो साल की उम्र से AIIMS के संपर्क में थी। परिवार का आरोप है कि वह वर्षों तक हार्ट सर्जरी का इंतजार करता रहा, जबकि अस्पताल का कहना है कि विस्तृत जांच के बाद 2017 में ही corrective surgery को संभव नहीं माना गया था। मौत के बाद AIIMS ने अब उच्चस्तरीय जांच कमेटी गठित की है।
नई दिल्ली/कोटा। एक बच्ची, जन्म से गंभीर हृदय रोग, इलाज की उम्मीद में अस्पताल के चक्कर और फिर 15 साल की उम्र में मौत। राजस्थान के कोटा की तन्वी परियानी की कहानी अब देश की स्वास्थ्य व्यवस्था और बड़े सरकारी अस्पतालों में गंभीर बीमारियों के इलाज की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रही है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!तन्वी की मौत दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी AIIMS में 1 सितंबर 2026 की सुबह हुई। वह पिछले करीब 13 वर्षों से इस संस्थान में इलाज और फॉलोअप के लिए आती रही थी। उसकी बीमारी सामान्य ‘दिल में छेद’ तक सीमित नहीं थी। मेडिकल रिकॉर्ड के अनुसार उसे Ventricular Septal Defect (VSD) के साथ Pulmonary Atresia था। यह जन्मजात हृदय की जटिल स्थिति है, जिसमें हृदय से फेफड़ों तक रक्त पहुंचने का सामान्य रास्ता गंभीर रूप से बाधित या अनुपस्थित होता है।
लेकिन तन्वी की कहानी में सबसे बड़ा सवाल उसकी मौत से ज्यादा उसके 13 साल के मेडिकल सफर को लेकर है।
दो साल की उम्र में शुरू हुआ AIIMS का सफर
AIIMS के रिकॉर्ड के अनुसार तन्वी पहली बार 10 अक्टूबर 2012 को महज दो साल की उम्र में अस्पताल पहुंची थी। जांच में VSD और pulmonary atresia की पहचान हुई।
इसके बाद उसके हृदय की स्थिति को समझने और ऑपरेशन की संभावना तलाशने के लिए कई जांचें की गईं। 2013 में CT angiography, conventional angiography और cardiac catheterisation जैसी जांचों का उल्लेख सामने आया है।
यहीं से कहानी का वह हिस्सा शुरू होता है जिस पर अब सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं।
2014 में सर्जरी की सलाह और 1.20 लाख रुपये का खर्च
परिवार के मुताबिक AIIMS के 31 जनवरी 2014 के एक दस्तावेज में तन्वी की बीमारी को “VSD + pulmonary atresia” बताया गया था। दस्तावेज में “unifocalisation & conduit” सर्जरी की सलाह दी गई थी और इसकी अनुमानित लागत करीब 1.20 लाख रुपये बताई गई थी।
यानी उस समय मेडिकल रिकॉर्ड में सर्जरी को एक विकल्प के तौर पर दर्ज किया गया था।
परिवार के अनुसार इसके बाद ऑपरेशन की तारीख तय होने की उम्मीद बनी। तन्वी के पिता मुकेश परियानी का कहना है कि 2015 में सर्जरी की तारीख तय हुई, लेकिन ऑपरेशन नहीं हो सका। परिवार का आरोप है कि तारीखें बदलती रहीं और उनकी बेटी ऑपरेशन का इंतजार करती रही।

परिवार का दावा बनाम AIIMS का पक्ष
यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
तन्वी के परिवार का कहना है कि वह वर्षों तक सर्जरी की उम्मीद में AIIMS आता-जाता रहा। पिता का आरोप है कि उन्होंने कई स्तरों पर शिकायतें भी कीं और बेटी के इलाज के लिए लगातार कोशिश करते रहे।
दूसरी ओर AIIMS का कहना है कि मामला इतना सीधा नहीं था।
अस्पताल के मुताबिक तन्वी की बीमारी और उसके हृदय की बनावट की विस्तृत जांच के बाद डॉक्टरों ने पाया कि corrective surgery करना सुरक्षित या व्यवहारिक नहीं था। AIIMS के अनुसार 2017 के आसपास treating team इस निष्कर्ष पर पहुंची कि उसकी जटिल cardiac anatomy के कारण corrective surgery संभव नहीं थी।
बाद की मेडिकल जांच में यह भी सामने आया कि फेफड़ों तक रक्त पहुंचाने वाली प्रमुख रक्त वाहिकाओं की स्थिति अत्यंत जटिल थी।
यानी परिवार की नजर में सवाल था—“ऑपरेशन क्यों नहीं हुआ?”
जबकि AIIMS का जवाब है—“जांच के बाद ऑपरेशन सुरक्षित/संभव नहीं था।”
अब AIIMS की जांच कमेटी को इसी अंतर की तह तक जाना है।
2016 में भी परिवार ने शिकायत की
परिवार ने 2016 में AIIMS में शिकायत दर्ज कराई थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार शिकायत को cardiac surgery विभाग में आगे की जांच और management के लिए भेजा गया।
लेकिन इसके बाद भी तन्वी का उपचार सर्जरी के बजाय मेडिकल मैनेजमेंट और फॉलोअप के रास्ते पर चला।
AIIMS का कहना है कि विस्तृत मूल्यांकन के बाद उसे corrective surgery के लिए उपयुक्त उम्मीदवार नहीं माना गया था।
2018 में क्या बदला?
मेडिकल रिकॉर्ड में 2018 का मूल्यांकन इस मामले का महत्वपूर्ण पड़ाव है।
रिपोर्टों के अनुसार इस समय तक डॉक्टरों ने तन्वी के हृदय की बनावट को बेहद जटिल पाया। फेफड़ों को रक्त पहुंचाने वाली प्रमुख रक्त वाहिकाओं के अभाव/गंभीर असामान्यता का भी उल्लेख सामने आया।
इसके बाद उसे corrective surgery के बजाय medical management और नियमित follow-up में रखा गया।
परिवार का सवाल
अगर 2014 में ऑपरेशन की सलाह दी गई थी, तो 2017-18 में उसे क्यों अनुपयुक्त माना गया?
क्या बीमारी की स्थिति बदल गई थी?
क्या शुरू से ही ऑपरेशन का जोखिम बहुत ज्यादा था?
2025 में फिर उठी इलाज की उम्मीद
तन्वी की तबीयत समय के साथ खराब होती गई। जून 2025 में उसके पिता ने फिर शिकायत की। परिवार की तरफ से आरोप लगाया गया कि उनकी बेटी अभी भी ऑपरेशन की प्रतीक्षा में है और बाहर इलाज कराने की आर्थिक क्षमता परिवार के पास नहीं है।
AIIMS के अनुसार उस समय तक वरिष्ठ cardiac surgeons की राय corrective surgery के बजाय medical management की ओर थी। परिवार ने बाहर भी इलाज और विशेषज्ञ राय लेने की कोशिश की।
फरवरी 2026 में PMO तक पहुंचा मामला
जब परिवार को AIIMS में समाधान नहीं मिला तो मामला प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचा।
तन्वी के पिता ने फरवरी 2026 में PMO से भी हस्तक्षेप की मांग की। इससे पहले भी परिवार की ओर से शिकायतें किए जाने की बात सामने आई है।
परिवार की शिकायत का मूल सवाल यही था—इतने वर्षों से इलाज चलने के बावजूद उनकी बेटी की सर्जरी क्यों नहीं हो सकी?
अगस्त 2026: मामला सर्जरी से ट्रांसप्लांट तक पहुंचा
तन्वी की हालत बिगड़ने पर उसे 24 अगस्त 2026 को AIIMS में भर्ती कराया गया।
इस बार डॉक्टर सिर्फ corrective heart surgery की संभावना नहीं देख रहे थे। अस्पताल के अनुसार तन्वी को संभावित heart-lung transplant के लिए evaluate किया जा रहा था।
यानी 13 साल पहले जिस बच्ची के लिए corrective surgery की संभावना देखी गई थी, 2026 तक उसकी बीमारी इतनी जटिल हो चुकी थी कि डॉक्टर संभावित heart-lung transplant के विकल्प का मूल्यांकन कर रहे थे।
AIIMS के अनुसार इसी सिलसिले में कई जांचें की जा रही थीं।
1 सितंबर की सुबह अचानक बिगड़ी तबीयत
तन्वी की मौत 1 सितंबर की सुबह हुई।
AIIMS के अनुसार रात करीब 2:50 बजे उसने कमजोरी और थकान की शिकायत की। इसके बाद उसकी हालत तेजी से बिगड़ी और वह cyanotic हो गई। उसका oxygen saturation लगभग 48 प्रतिशत तक गिर गया।
उसे ऑक्सीजन सपोर्ट दिया गया।
इसके बाद उसे hypoxic spell आया और cardiac arrest हो गया।
डॉक्टरों ने उसे बचाने के लिए resuscitation की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। AIIMS के अनुसार उसे सुबह 5:06 बजे मृत घोषित किया गया।
मौत के बाद उठे सवाल
तन्वी की मौत के बाद उसके पिता ने इलाज और अस्पताल में हुई घटनाओं को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
परिवार का कहना है कि यदि इतने वर्षों तक सर्जरी की उम्मीद बनी रही और इलाज चलता रहा, तो आखिरकार उनकी बेटी को वह उपचार क्यों नहीं मिला जिसकी वे उम्मीद करते रहे?
परिवार ने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
हालांकि, इन आरोपों को अभी अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। यही वजह है कि AIIMS ने भी मामले की जांच कराने का फैसला किया है।
AIIMS ने बनाई जांच कमेटी
मामला सार्वजनिक होने के बाद AIIMS प्रशासन ने एक उच्चस्तरीय समिति गठित की है।
समिति तन्वी के पूरे medical record, investigations, treatment, विशेषज्ञों की राय और इलाज के दौरान हुई घटनाओं की समीक्षा करेगी। उसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि तन्वी के मामले में शुरुआत से लेकर मृत्यु तक क्या-क्या हुआ और उपचार संबंधी फैसले किस मेडिकल आधार पर लिए गए।
मौत के कारण और परिस्थितियों को समझने में autopsy/post-mortem findings भी महत्वपूर्ण होंगी।
AIIMS ने साफ किया है कि अंतिम निष्कर्ष जांच और उपलब्ध मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जाएगा।
13 साल की देरी या जटिल बीमारी?
तन्वी मामले को केवल “13 साल तक ऑपरेशन नहीं हुआ” क्योंकि अस्पताल का कहना है कि उसकी बीमारी अत्यंत जटिल थी और विस्तृत जांच के बाद corrective surgery को जोखिमपूर्ण/असंभव माना गया।
लेकिन दूसरी तरफ 2014 का दस्तावेज सामने है जिसमें “unifocalisation & conduit” सर्जरी की सलाह और खर्च का अनुमान दर्ज है।
इसलिए अब जांच के सामने कम से कम ये सवाल हैं—
पहला: 2014 में सर्जरी की सलाह किस आधार पर दी गई थी?
दूसरा: अगर ऑपरेशन की योजना बनी थी तो वह क्यों नहीं हुआ?
तीसरा: 2015 में कथित रूप से तय सर्जरी क्यों नहीं हुई?
चौथा: 2017 में किस मेडिकल मूल्यांकन के आधार पर corrective surgery को अनुपयुक्त माना गया?
पांचवां: क्या यह निर्णय परिवार को स्पष्ट रूप से बताया गया था?
छठा: क्या 2014 से 2018 के बीच तन्वी की बीमारी या उसकी cardiac anatomy में ऐसा बदलाव आया जिसने सर्जरी की संभावना खत्म कर दी?
सातवां: 2025 और 2026 में परिवार की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई?
आठवां: अगस्त 2026 में जब तन्वी transplant evaluation के लिए भर्ती हुई, तब उसकी clinical स्थिति क्या थी?
और सबसे अहम—क्या उसकी मौत उसकी मूल बीमारी की स्वाभाविक प्रगति थी या इलाज की प्रक्रिया में किसी स्तर पर ऐसी चूक हुई जिसने परिणाम को प्रभावित किया?
इन सवालों का जवाब फिलहाल जांच के बाद ही मिल सकेगा।
तन्वी की कहानी ने स्वास्थ्य व्यवस्था के बड़े सवाल खड़े किए
तन्वी की मौत एक परिवार की त्रासदी जरूर है, लेकिन इसके साथ सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े कई बड़े सवाल भी सामने आते हैं।
खैर देश के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों की लंबी कतार रहती है। लेकिन जटिल congenital heart disease के मामलों में केवल ऑपरेशन उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि मरीज की स्थिति का समय पर मूल्यांकन हो, परिवार को स्पष्ट रूप से बताया जाए कि कौन-सा इलाज संभव है और कौन-सा नहीं, और यदि एक उपचार विकल्प बंद हो जाए तो दूसरा विकल्प समय रहते तलाशा जाए।
















