Supreme Court gets five new judges, President Murmu approves the appointments

स्कूल ठीक करो’ अभियान के बीच सुप्रीम कोर्ट में सरकारी स्कूलों में एंट्री और फोटो-वीडियो पर रोक के खिलाफ याचिका खारिज

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डेस्क , 3 सितंबर 2026। सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों, पत्रकारों और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों के प्रवेश तथा फोटो-वीडियो बनाने पर लगाई गई पाबंदियों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई करने से इनकार कर दिया। यह मामला राजस्थान और उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में लगाए गए प्रतिबंधों से जुड़ा था।

याचिका में आरोप लगाया गया था कि इन प्रतिबंधों की वजह से सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति को सामने लाना मुश्किल हो सकता है। याचिकाकर्ता ने कहा था कि स्कूलों में खराब भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली, मिड-डे मील और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति की तस्वीर या वीडियो बनाकर उन्हें सार्वजनिक करना जनहित में जरूरी है।

क्या है पूरा मामला?

राजस्थान सरकार के माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने 16 अगस्त 2026 को एक सर्कुलर जारी किया था। इसमें सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश के लिए स्कूल के प्रधानाचार्य या संस्था प्रधान से पहले अनुमति लेना जरूरी किया गया था।

इसके अलावा स्कूल परिसर में फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू, ऑडियो रिकॉर्डिंग और लाइव स्ट्रीमिंग के लिए भी पूर्व लिखित अनुमति की व्यवस्था की गई थी।

उत्तर प्रदेश में भी कुछ जिलों में इसी तरह के निर्देश जारी किए गए थे। इन निर्देशों के तहत पत्रकारों, यूट्यूबर्स, सोशल मीडिया से जुड़े लोगों और अन्य बाहरी लोगों के लिए बिना अनुमति स्कूल परिसर में प्रवेश या रिकॉर्डिंग पर रोक लगाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?

इन आदेशों को चुनौती देते हुए प्रिया मिश्रा की ओर से सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई। याचिका में कहा गया कि सरकारी स्कूल जनता के पैसे से चलते हैं, इसलिए उनकी व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं की स्वतंत्र निगरानी और दस्तावेजीकरण पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(1)(g), 21 और 21-A का हवाला देते हुए कहा गया कि व्यापक प्रतिबंध नागरिकों और मीडिया की अभिव्यक्ति तथा सार्वजनिक हित से जुड़ी गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं।

याचिका में बच्चों की निजता और सुरक्षा का भी ध्यान रखने की बात कही गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि बच्चों की पहचान वाली तस्वीरें या वीडियो बनाने पर सुरक्षा संबंधी नियम लागू किए जा सकते हैं, लेकिन स्कूल की इमारत, शौचालय, पानी, बिजली या दूसरी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को रिकॉर्ड करने पर पूरी तरह रोक नहीं होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

3 सितंबर को जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस रिट याचिका पर विचार करने की इच्छुक नहीं है।

इसका मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई विस्तृत फैसला देकर यह नहीं कहा कि सरकारी स्कूलों में फोटो या वीडियो बनाने पर रोक हमेशा के लिए सही है। अदालत ने फिलहाल इस याचिका के जरिए मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया है।

‘स्कूल ठीक करो’ अभियान से क्या है कनेक्शन?

यह मामला ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के बीच सामने आया। इस अभियान के जरिए सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं और उनकी कमियों को सार्वजनिक करने की कोशिश की जा रही है।

अभियान से जुड़े लोगों का तर्क है कि अगर स्कूलों की वास्तविक स्थिति की तस्वीरें और वीडियो सामने नहीं आएंगे तो खराब भवन, टूटे शौचालय, पानी की समस्या, बिजली की कमी या दूसरी कमियों पर सार्वजनिक दबाव बनाना मुश्किल होगा।

यही वजह है कि सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों और मीडिया की एंट्री पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर पारदर्शिता और बच्चों की सुरक्षा के बीच संतुलन का सवाल उठ रहा है।

बच्चों की सुरक्षा बनाम पारदर्शिता

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चों की सुरक्षा है। स्कूल परिसर में बच्चों की तस्वीरें या वीडियो उनकी निजता और सुरक्षा से जुड़ा संवेदनशील विषय है। इसलिए बच्चों की पहचान उजागर करने वाली रिकॉर्डिंग पर नियम होना स्वाभाविक है।

लेकिन दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में उपलब्ध सुविधाएं भी सार्वजनिक महत्व का विषय हैं। सवाल यह है कि बच्चों की निजता की रक्षा करते हुए स्कूल की बुनियादी सुविधाओं और सरकारी व्यवस्था की स्वतंत्र निगरानी कैसे सुनिश्चित की जाए।

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