मां की ममता ने मौत को भी हरा दिया! 8 साल की मिशा दुनिया छोड़ गई, लेकिन अपनी आंखों से दो जिंदगियों में भरेगी रोशनी
धनबाद की एक मां की आंखों में आज अपनी आठ साल की बेटी को खोने का ऐसा दर्द है, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। जिस बेटी की उंगली पकड़कर उसे जिंदगी की राह दिखानी थी, आज उसी बेटी को हमेशा के लिए विदा करना पड़ा। जिस मासूम की किलकारियों से घर गूंजता था, वहां अब सन्नाटा पसरा है। लेकिन इस सन्नाटे के बीच एक ऐसी उम्मीद जन्मी है, जिसने इंसानियत को भावुक कर दिया है। आठ साल की मिशा दुनिया छोड़ गई, लेकिन उसकी मां ने उसे पूरी तरह जाने नहीं दिया। बेटी की आंखों का दान कर मां ने दो ऐसे लोगों की जिंदगी में रोशनी भरने का फैसला किया है, जो वर्षों से अंधेरे में जी रहे हैं। अब मिशा की आंखों से कोई दुनिया देखेगा, अपने अपनों का चेहरा पहचानेगा, सूरज की रोशनी महसूस करेगा और शायद पहली बार अपने जीवन में रंगों को देख पाएगा। एक मां के लिए इससे बड़ा संतोष क्या होगा कि उसकी बेटी की आंखों से किसी दूसरे की दुनिया रोशन होगी। लेकिन इस फैसले के पीछे छिपा दर्द शायद वही मां समझ सकती है, जिसने अपनी बच्ची को खोया है।

जब बचपन अस्पतालों के चक्कर में सिमट गया
मिशा का जन्म दूसरे बच्चों की तरह खुशियों और उम्मीदों के साथ हुआ था। लेकिन जन्म से ही थैलेसीमिया मेजर जैसी गंभीर बीमारी ने उसके बचपन को घेर लिया।जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, स्कूल जाते हैं, दोस्तों के साथ शरारत करते हैं और आसमान छूने के सपने देखते हैं, उस उम्र में मिशा की दुनिया अस्पताल के बिस्तर, रक्त चढ़ाने की प्रक्रिया, दवाइयों और इंजेक्शन के दर्द तक सिमट गई थी।
हर कुछ सप्ताह में रक्त चढ़ाना उसकी जिंदगी की मजबूरी थी। रक्त चढ़ने के बाद उसके चेहरे पर थोड़ी रौनक लौटती, मां की आंखों में उम्मीद जागती और परिवार सोचता कि शायद अब कुछ दिन अच्छे गुजरेंगे।
लेकिन बीमारी फिर लौट आती।
हर बार अस्पताल जाते हुए मां के मन में एक ही सवाल उठता होगा—क्या मेरी बेटी कभी इस दर्द से बाहर निकल पाएगी? क्या वह भी दूसरे बच्चों की तरह बिना किसी डर के अपना बचपन जी पाएगी?
बेटी को बचाने के लिए मां ने हर दरवाजा खटखटाया
मिशा की मां ने अपनी बच्ची को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। रिश्तेदारों से मदद मांगी, इलाज के लिए पैसे जुटाने की कोशिश की और डॉक्टरों से बेटी के भविष्य के बारे में उम्मीदें तलाशती रहीं।डॉक्टरों ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट यानी स्टेम सेल ट्रांसप्लांट को स्थायी इलाज का संभावित विकल्प बताया। लेकिन इस इलाज की भारी लागत और लंबी चिकित्सा प्रक्रिया परिवार के लिए बड़ी चुनौती बन गई।

एक तरफ बेटी की जिंदगी बचाने की उम्मीद थी, दूसरी तरफ आर्थिक तंगी की कठोर सच्चाई।
मां के लिए पैसे सिर्फ पैसे नहीं थे। वे अपनी बेटी की सांसें थीं, उसका बचपन था, उसका भविष्य था।लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वह अपनी बच्ची को बचा नहीं सकीं।
आखिरकार आठ साल की मिशा की जिंदगी थम गई।
बेटी के जाने के बाद भी मां ने बुझने नहीं दी उम्मीद
बेटी की मौत के बाद किसी मां की दुनिया उजड़ जाती है। जिस घर में बच्चे की हंसी गूंजती थी, वहां उसकी यादें रह जाती हैं। जिस गोद में बच्ची खेलती थी, वह गोद हमेशा के लिए खाली हो जाती है। मिशा की मां भी इस असहनीय दुख से गुजर रही हैं। लेकिन इस दुख के बीच उन्होंने ऐसा फैसला लिया, जो हर संवेदनशील इंसान की आंखें नम कर सकता है।
अपनी बेटी का नेत्रदान कराया।
अब मिशा की आंखों के कॉर्निया दो जरूरतमंद लोगों को नई रोशनी देने का माध्यम बनेंगे। जिन आंखों ने आठ साल तक इस दुनिया को देखा, उन्हीं आंखों से अब कोई और अपने परिवार को देख सकेगा।किसी मां के लिए यह सोच पाना भी कितना कठिन होगा कि उसकी बच्ची अब किसी और की आंखों से इस दुनिया में मौजूद रहेगी।मिशा चली गई, लेकिन उसकी आंखों से किसी की मां अपने बच्चे को देख सकेगी। कोई बच्चा अपने माता-पिता का चेहरा पहचान सकेगा। किसी परिवार के घर में वर्षों बाद खुशियों की रोशनी लौट सकती है।
यही नेत्रदान की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
एक छोटी जिंदगी, लेकिन इंसानियत का बहुत बड़ा संदेश
मिशा की कहानी सिर्फ एक बच्ची की बीमारी और मौत की कहानी नहीं है। यह उस मां की कहानी है, जिसने अपनी सबसे बड़ी पीड़ा को दूसरों के जीवन की उम्मीद में बदल दिया। थैलेसीमिया से जूझ रहे बच्चों के लिए नियमित रक्तदान जीवन बचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। वहीं, नेत्रदान किसी दृष्टिहीन व्यक्ति को नई दुनिया देखने का अवसर दे सकता है।मिशा की मां का फैसला समाज को यह संदेश देता है कि जिंदगी की आखिरी सांस के बाद भी इंसान किसी के काम आ सकता है।आज मिशा की मां अपनी बेटी को पुकारेंगी तो शायद कोई जवाब नहीं आएगा। उसकी छोटी-छोटी चीजें देखकर आंखें भर आएंगी। लेकिन कहीं न कहीं यह एहसास भी होगा कि उनकी बेटी की आंखों से कोई और दुनिया देख रहा है।मिशा की जिंदगी भले ही आठ साल में थम गई, लेकिन उसकी आंखों से दो जिंदगियों में नई सुबह आने की उम्मीद है।एक मां ने अपनी बेटी को खो दिया, लेकिन उसी मां ने दो अनजान परिवारों को उम्मीद का ऐसा उपहार दिया है, जिसकी कीमत दुनिया की किसी दौलत से नहीं लगाई जा सकती।मिशा अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उसकी आंखों से जब कोई पहली बार रोशनी देखेगा, तो शायद उस पल एक मां के दिल में यह एहसास जरूर जागेगा—
“मेरी बेटी चली गई, लेकिन उसकी आंखों से आज भी दुनिया जिंदा है।” ……..माँ

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