बोकारो: परंपरा की बेड़ियाँ तोड़ बेटी ने दिया मां की अर्थी को कंधा, नम आँखों से दी अंतिम विदाई

बोकारो/ढोरी: अक्सर समाज में अंतिम संस्कार की रस्मों को पुरुषों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन बोकारो के ढोरी स्टाफ क्वार्टर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने इन मान्यताओं को झकझोर कर रख दिया है। यहाँ एक बेटी ने अपनी माँ के अंतिम सफर में न केवल शामिल होकर, बल्कि उनकी अर्थी को कंधा देकर बेटी होने का फर्ज बखूबी निभाया।
ममता का कर्ज और अटूट प्रेम का प्रदर्शन
बताया जाता है कि बोकारो के ढोरी स्टाफ क्वार्टर निवासी चंदन चौहान की माँ का रांची में इलाज के दौरान निधन हो गया। शनिवार को जब उनकी अंतिम यात्रा शुरू हुई, तो हर किसी की आँखें नम हो गईं। इस दुखद घड़ी में मृतक की बेटी ने अपनी माँ के प्रति अपनी अकीदत और प्रेम का जो परिचय दिया, उसने वहाँ मौजूद हर व्यक्ति को स्तब्ध कर दिया।
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परंपराओं और सामाजिक झिझक की परवाह किए बिना बेटी ने आगे बढ़कर अपनी माँ की अर्थी को कंधा दिया। अर्थी से लिपटी बेटी की नम आँखों में वह दर्द और माँ के प्रति असीम प्रेम झलक रहा था, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
समाज के लिए प्रेरणा
वहाँ उपस्थित स्थानीय निवासियों ने इस दृश्य को एक ‘मिसाल’ बताया। लोगों का कहना था कि यह न केवल एक अंतिम संस्कार है, बल्कि एक बेटी का अपनी माँ के प्रति आखिरी सलाम है। एक स्थानीय व्यक्ति ने भावुक होते हुए कहा, “कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं, एहसासों से परिभाषित होते हैं। आज इस बेटी ने साबित कर दिया कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं हैं।”
बदलता समाज और बढ़ती संवेदनशीलता
समाज में जहाँ बेटियों को लेकर पुरानी सोच रखने वाले लोग आज भी मौजूद हैं, वहीं ढोरी की यह घटना एक बड़ा संदेश दे रही है। यह दृश्य दिखाता है कि बेटियां अब न केवल शिक्षित हो रही हैं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में परिवार की सबसे बड़ी ताकत बनकर खड़ी हो रही हैं।
बेटी द्वारा निभाए गए इस अंतिम फर्ज की तस्वीरें सोशल मीडिया और स्थानीय चर्चाओं में खूब वायरल हो रही हैं। लोग बेटी के इस साहस और अपनी माँ के प्रति समर्पण की जमकर सराहना कर रहे हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि ममता का कोई लिंग नहीं होता, और संतान का धर्म केवल सेवा करना है—चाहे जीवन में हो या मृत्यु के पश्चात।
















