Dhanbad Mayor Sanjeev Refuses to Accept Honorarium

धनबाद: राजनीति के ‘संत’ ए.के. राय की राह पर मेयर संजीव, मानदेय लेने से किया इंकार

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धनबाद के मेयर संजीव सिंह ने पूर्व सांसद ए.के. रॉय की सादगी को दोहराते हुए अपना मानदेय लेने से इंकार कर दिया है। राजनीति में ईमानदारी की नई मिसाल पेश करते हुए मेयर ने फिजूलखर्ची रोकने और जनता दरबार के जरिए समस्याओं के समाधान का संकल्प लिया।

Dhanbad Mayor Sanjeev Refuses to Accept Honorarium

धनबाद। कोयलांचल की राजनीति में एक बार फिर सादगी और त्याग का दौर लौटता दिख रहा है। धनबाद नगर निगम के मेयर संजीव सिंह ने ‘राजनीति के संत’ कहे जाने वाले पूर्व सांसद स्वर्गीय ए.के. राय के पदचिन्हों पर चलते हुए ऐतिहासिक फैसला लिया है। मेयर ने आधिकारिक तौर पर अपना मासिक मानदेय (Salary) लेने से इंकार कर दिया है।

निस्वार्थ सेवा की नई मिसाल

मेयर संजीव सिंह ने नगर निगम प्रशासक को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि वे पद पर रहते हुए किसी भी प्रकार का वेतन या भत्ता स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, “मेरा लक्ष्य मेयर पद को निजी लाभ का जरिया बनाना नहीं, बल्कि शहर का विकास करना है। मेरे मानदेय की राशि को अन्य विकास योजनाओं में खर्च किया जाए।”

फिजूलखर्ची पर लगेगी लगाम

संजीव सिंह ने केवल वेतन ही नहीं छोड़ा, बल्कि निगम में होने वाली फिजूलखर्ची पर भी कड़े निर्देश दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि

निगम के संसाधनों का उपयोग केवल जनहित और पारदर्शिता के साथ होगा।
सरकारी कार्यक्रमों में दिखावे और तामझाम पर पूरी तरह रोक रहेगी।
जनता की शिकायतों के लिए नियमित ‘जनता दरबार’ लगेगा, जहाँ समस्याओं का ऑन-द-स्पॉट समाधान सुनिश्चित किया जाएगा।

याद आए ‘राय दा’

यह कदम धनबाद के दिग्गज नेता और मार्क्सवादी समन्वय समिति (MCC) के संस्थापक अशोक कुमार राय (ए.के. राय) की याद दिलाता है। ए.के. राय ने तीन बार सांसद और तीन बार विधायक रहने के बावजूद कभी सरकारी पेंशन नहीं ली। उन्होंने 1991 में संसद में वेतन वृद्धि का विरोध किया था और अपनी पेंशन को राष्ट्रपति राहत कोष में दान कर देते थे। संजीव सिंह झारखंड के पहले ऐसे मेयर बन गए हैं जिन्होंने इस महान परंपरा को जीवित किया है।

अधिकारियों को सख्त निर्देश

मेयर ने नगर निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों को कार्यशैली में सुधार लाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि अधिकारी जनसेवा की भावना से काम करें और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन सुनिश्चित करें। उनके इस फैसले की राजनीतिक गलियारों और आम जनता के बीच काफी सराहना हो रही है।

बड़ी बात:

झारखंड की सियासत में जहाँ अक्सर जनप्रतिनिधि सुविधाओं और भत्तों के लिए चर्चा में रहते हैं, वहीं संजीव सिंह का यह स्वैच्छिक त्याग अन्य नेताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

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Drishti Now Desk

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