शहादत का अपमान या सिस्टम की संवेदनहीनता? ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के शहीद रामबाबू सिंह की पत्नी धनबाद में बदहाली के आंसू बहाने को मजबूर
ऑपरेशन सिंदूर’ के शहीद रामबाबू सिंह की पत्नी अंजलि धनबाद में 8 महीने की बच्ची संग दाने-दाने को मोहताज। बिहार सरकार का 50 लाख का मुआवजा सिर्फ कागजों पर, धनबाद के नेताओं ने भी मोड़ा मुंह।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!धनबाद: देश जब किसी जवान की शहादत पर गर्व करता है, तब राजनेताओं के भाषणों में सम्मान, सहायता और हरसंभव सहयोग के बड़े-बड़े वादे गूंजते हैं। लेकिन समय बीतने के साथ अक्सर वही शहीद परिवार सरकारी फाइलों, दफ्तरों के चक्करों और सिस्टम की उदासीनता में कहीं खो जाता है।
ऐसी ही एक दर्दनाक और व्यवस्था को कटघरे में खड़ी करती कहानी सामने आई है ‘ऑपरेशन सिंदूर’में शहीद हुए रामबाबू सिंह की पत्नी अंजलि की। अंजलि आज धनबाद में अपनी महज 8 महीने की मासूम बच्ची के साथ बेहद संघर्षपूर्ण और असुरक्षित जीवन जीने को विवश हैं।
कागजों और सुर्खियों में सिमटा बिहार सरकार का 50 लाख का मुआवजा
शहीद रामबाबू सिंह के सर्वोच्च बलिदान के बाद बिहार सरकार द्वारा उनके परिवार के लिए 50 लाख रुपये के मुआवजे और सरकारी नौकरी की बड़ी घोषणा की गई थी। लेकिन अंजलि का गंभीर आरोप है कि यह घोषणा केवल कागजों, सरकारी बयानों और मीडिया की सुर्खियों तक ही सीमित रह गई।
सरकारी दफ्तरों की चौखट लांघने के बावजूद उन्हें सिर्फ ‘प्रक्रिया’ का हवाला देकर और कोरा आश्वासन देकर लौटा दिया जाता है। अंजलि को सीवान स्थित घर की चाबी तो सौंप दी गई, लेकिन बुनियादी सुरक्षा और सुविधाओं के अभाव में वो वहां रहने की स्थिति में नहीं हैं। अंजलि का तीखा सवाल है— “एक अकेली महिला अपनी दूधमुंही बच्ची के साथ आखिर वहां कितनी सुरक्षित रह पाएगी?”
अपनों ने भी मोड़ा मुंह, ससुराल पक्ष से मिला धोखा
अंजलि का दर्द केवल संवेदनहीन सरकारी तंत्र तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि पति की शहादत के बाद ससुराल पक्ष का व्यवहार भी पूरी तरह बदल गया। जिस सहारे, प्यार और अधिकार की उन्हें उम्मीद थी, वह अब पारिवारिक विवादों की भेंट चढ़ चुका है। आज वह अपनी मासूम बच्ची के भविष्य को लेकर गहरी आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव के बीच दिन काट रही हैं।
धनबाद के जनप्रतिनिधियों की बेरुखी: “कोई झांकने तक नहीं आया”
अंजलि वर्तमान में झारखंड के धनबाद में रह रही हैं, लेकिन यहां के स्थानीय सिस्टम और नेताओं ने भी उनसे पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है। शहीद की पत्नी ने बेहद भावुक और आक्रोशित लहजे में जनप्रतिनिधियों पर सवाल दागते हुए कहा:
“मैं धनबाद में रह रही हूं, लेकिन यहां के कोई भी सांसद या विधायक आज तक मेरा हालचाल जानने या मुझसे मिलने नहीं आए। चुनाव के वक्त बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेता आज इस शहीद के परिवार की सुध लेने की फुर्सत में नहीं हैं।”
“क्या ‘झारखंड की बेटी’ को अपनी जन्मभूमि से मिलेगा न्याय?”
झारखंड की मूल निवासी होने के कारण अब अंजलि की आखिरी उम्मीदें अपनी जन्मभूमि और झारखंड सरकार से टिकी हैं। उन्होंने रोते हुए मुख्यमंत्री और प्रशासन से अपील की है कि—
“मैं झारखंड की बेटी हूं। क्या एक बेटी और शहीद की पत्नी होने के नाते मुझे यहां से कोई सहायता, रोजगार या सम्मान मिलेगा? क्या मेरी 8 महीने की बच्ची का भविष्य सुरक्षित हो पाएगा?”
पति की शहादत को अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन अंजलि के लिए यह समय किसी सदी से कम नहीं रहा। अंजलि आज भी आस लगाए बैठी हैं कि उनके पति का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा और सरकारें अपनी गहरी नींद से जागेंगी।


















