Farmer from Latehar turns bike into a 'Jugaad' plough.

न बैल हैं, न ट्रैक्टर, पर इरादे बुलंद : लातेहार के किसान ने बाइक को बनाया ‘जुगाड़ हल’, सूखे खेतों में जगाई उम्मीद

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Farmer from Latehar turns bike into a 'Jugaad' plough.

लातेहार (झारखंड): कहावत है कि  आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है’, लेकिन झारखंड के लातेहार जिले के हेरहंज प्रखंड के आरा-हारा गांव में रहने वाले किसान रवींद्र मिस्त्री ने इसे ‘संघर्ष की जननी’ बना दिया है। संसाधनों के घोर अभाव और प्रकृति की बेरुखी के बीच, रवींद्र की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है, जो खेती के प्रति एक किसान के अटूट समर्पण को बयां कर रही है।

सूखे की मार और संसाधनों का संकट

वर्तमान में खेती का सीजन जोरों पर है, लेकिन रवींद्र के सामने चुनौतियों का पहाड़ है। न उनके पास अपना ट्रैक्टर है, न हल चलाने के लिए बैलों की जोड़ी। आर्थिक तंगी का आलम यह है कि किराये पर ट्रैक्टर लेना भी उनके सामर्थ्य से बाहर है। ऊपर से इस वर्ष मानसून की दगाबाजी और कम बारिश के कारण खेत सूखे पड़े हैं। सामान्य से कम बारिश ने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

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जब बाइक बनी ‘खेती का आधार’

इन कठिन परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने के बजाय रवींद्र ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल को ही ‘देसी ट्रैक्टर’ का रूप दे दिया। बाइक के पिछले हिस्से में हल का ‘जुगाड़’ जोड़कर उन्होंने न केवल सूखे खेतों को जोतने का साहसिक कार्य किया, बल्कि मकई की बुआई भी शुरू कर दी। खेत में दौड़ती उनकी मोटरसाइकिल अब केवल एक वाहन नहीं, बल्कि एक किसान के जीवट की कहानी बन गई है।

‘मेहनत ही हमारा सहारा’

अपने संघर्ष पर बात करते हुए रवींद्र मिस्त्री कहते हैं, “बारिश कम हुई है, स्थिति कठिन है, लेकिन उम्मीद है कि फसल अच्छी होगी। ट्रैक्टर और बैल नहीं थे, इसलिए मजबूरी में बाइक से ही खेत तैयार कर रहा हूं। मेहनत ही हमारा सहारा है और पेट पालने के लिए यह जज्बा जरूरी है।”

कृषि व्यवस्था पर एक आईना

रवींद्र मिस्त्री की यह कहानी केवल एक गांव की नहीं, बल्कि उन हजारों किसानों की हकीकत है जो हर साल सरकारी सुविधाओं के अभाव, मौसम की मार और आर्थिक तंगी के बीच देश का पेट भरने का फर्ज निभाते हैं। जिस पसीने से देश की थाली भरती है, वह आज भी आधुनिक युग में ‘जुगाड़’ के सहारे खेती करने को मजबूर है।

यह तस्वीर इस बात का सबूत है कि किसान चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियों में हो, वह उम्मीद का बीज बोना नहीं छोड़ता। अब देखना यह है कि क्या रवींद्र जैसे साहसी किसानों तक सरकारी सहायता पहुँच पाएगी, या उनका संघर्ष इसी तरह ‘जुगाड़’ के इर्द-गिर्द घूमता रहेगा?

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