पांच किलोमीटर की पगडंडी और बच्चों की उम्मीद, सालोमी के कदम नहीं रुकते
लातेहार के दुर्गम इलाके में रोज जंगल-पहाड़ पार कर आंगनबाड़ी पहुंचती हैं सेविका सालोमी हेरेंज
लातेहार। जहां आम लोगों के लिए पांच किलोमीटर का रास्ता कुछ ही समय में पूरा हो जाता है, वहीं लातेहार के भोकाखाड़ से लुंदी तक का सफर किसी चुनौती से कम नहीं है। इसी कठिन रास्ते को सालोमी हेरेंज रोज पैदल तय करती हैं। वजह है लुंदी गांव के उन बच्चों से जुड़ी जिम्मेदारी, जिन्हें वह आंगनबाड़ी केंद्र में पढ़ाती और पोषण संबंधी सेवाएं देती हैं। सालोमी का घर भोकाखाड़ गांव में है और उनकी ड्यूटी लुंदी स्थित आंगनबाड़ी केंद्र में है। दोनों स्थानों के बीच सड़क की सीधी और आसान सुविधा नहीं है। उन्हें जंगल और पहाड़ी इलाके से गुजरने वाली पगडंडी पकड़नी पड़ती है।

बारिश का मौसम उनके इस सफर को और कठिन बना देता है। रास्ते में दो छोटी बरसाती नदियां पड़ती हैं। सामान्य दिनों में इन्हें पार करना संभव है, लेकिन बारिश के दौरान पानी बढ़ने पर जोखिम भी बढ़ जाता है। इसके बावजूद सालोमी की दिनचर्या नहीं बदलती। वह सुबह घर से निकलती हैं और पैदल चलते हुए केंद्र तक पहुंचती हैं। वहां पहुंचने के बाद बच्चों की गतिविधियां शुरू होती हैं। पढ़ाई के साथ बच्चों को मिलने वाले पोषाहार और आंगनबाड़ी से जुड़ी दूसरी जिम्मेदारियां भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं।


इस इलाके में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां सरकारी सेवाओं की राह में बड़ी चुनौती हैं। ऐसे में सालोमी का रोजाना केंद्र तक पहुंचना बताता है कि दूरदराज के गांवों में किसी सरकारी सुविधा को लगातार चलाए रखना सिर्फ व्यवस्था का काम नहीं, बल्कि उसे जमीन पर लागू करने वाले लोगों की व्यक्तिगत मेहनत पर भी निर्भर करता है।
भोकाखाड़ से लुंदी तक की यह पांच किलोमीटर की दूरी नक्शे पर भले छोटी दिखाई दे, लेकिन सालोमी के लिए यह रोज की परीक्षा है। जंगल और पहाड़ों के बीच से गुजरती उनकी यह यात्रा उन बच्चों तक सरकारी पोषण और शुरुआती शिक्षा की सेवाएं पहुंचाने का माध्यम बनी हुई है।

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