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सारंडा वन क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आज महत्वपूर्ण सुनवाई

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झारखंड के प्रसिद्ध सारंडा वन क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य (वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी) और संरक्षण रिजर्व के रूप में अधिसूचित करने से जुड़ी याचिका पर आज भारत के सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हो रही है। यह मामला पर्यावरण संरक्षण और खनन गतिविधियों के बीच संतुलन को लेकर वर्षों से चला आ रहा है, और आज की सुनवाई में राज्य के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया गया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर 2025 को झारखंड सरकार को कड़ी चेतावनी जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि 7 अक्टूबर 2025 तक सारंडा और ससंगदा बुरू वनों को अभयारण्य घोषित न करने पर मुख्य सचिव को जेल की सजा का सामना करना पड़ सकता है। जस्टिस विनोद चंद्रन की बेंच ने सरकार की ओर से बार-बार देरी को अदालत की अवमानना करार दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा, “झारखंड सरकार न केवल टालमटोल कर रही है, बल्कि न्यायालय के साथ छल भी कर रही है।”

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इससे पहले, 29 अप्रैल 2025 को झारखंड सरकार के वन एवं पर्यावरण विभाग के सचिव ने कोर्ट में देरी के लिए माफी मांगी थी और 57,519.41 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य तथा 13,603.80 हेक्टेयर को ससंगदा बुरू संरक्षण रिजर्व घोषित करने का वादा किया था। हालांकि, यह वादा अब तक पूरा नहीं हुआ। कोर्ट ने 26 सितंबर 2025 को भी सरकार को फटकार लगाई थी, जिसमें सारंडा/ससंगदा बुरू वनों को अभयारण्य घोषित करने में लगातार असफलता पर नाराजगी जताई गई।

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झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित सारंडा एशिया का सबसे बड़ा सल वन क्षेत्र है, जो लगभग 1 लाख हेक्टेयर में फैला हुआ है। यह क्षेत्र जैव विविधता का खजाना है, जहां हाथी, बाघ, तेंदुआ और सैकड़ों पक्षी प्रजातियां निवास करती हैं। पर्यावरणविदों और पूर्व विधायक सरयू राय जैसे कार्यकर्ताओं का कहना है कि खनन कंपनियों के दबाव में सरकार वन क्षेत्र को कम करने की कोशिश कर रही है, जो वन्यजीवों और स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए खतरा है।

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सरयू राय ने 30 सितंबर 2025 को रांची प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार पर दबाव बढ़ाया और कहा कि कई उच्च स्तरीय समितियों ने अभयारण्य घोषणा की सिफारिश की है, लेकिन सरकार उदासीन बनी हुई है। कोर्ट ने इस मामले में एक उच्च स्तरीय समिति गठित की है, जिसमें मुख्य वन संरक्षक (वाइल्डलाइफ), डीएफओ (एलीफेंट प्रोजेक्ट) और माइंस एंड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के अधिकारी शामिल हैं। यह समिति नए सिरे से क्षेत्र निर्धारण करेगी।

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आज की सुनवाई चीफ जस्टिस के कोर्ट में सूचीबद्ध है, और इसमें सरकार की प्रगति रिपोर्ट पर विचार किया जाएगा। यदि अधिसूचना जारी न हुई हो, तो मुख्य सचिव को तलब करने के अलावा कोर्ट कठोर कदम उठा सकता है। पर्यावरण संगठनों ने उम्मीद जताई है कि यह फैसला न केवल सारंडा को बचाएगा, बल्कि पूरे देश में वन संरक्षण को मजबूत करेगा।

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