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कारगिल योद्धा से किसान बने निस्टर खेस की प्रेरक कहानी ने सिमडेगा DC कंचन सिंह IAS को भावुक किया

शंभू कुमार सिंह

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रांची/सिमडेगा : झारखंड के सिमडेगा जिले के सुदूर दियापत्थल गांव की बिरहोर बस्ती में एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो देशभक्ति, मेहनत और नागरिक अधिकारों के बोध को एक साथ दर्शाती है। सिमडेगा की उपायुक्त (DC) कंचन सिंह IAS ने अपनी फेसबुक पोस्ट में इस रोचक अनुभव को साझा किया है, जो गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर विशेष प्रासंगिकता रखता है।

कंचन सिंह ने बताया कि हाल ही में वे सिमडेगा प्रखंड के अंतर्गत दियापत्थल गांव की बिरहोर बस्ती का दौरा करने गई थीं। यहां की आदिम जनजाति पीढ़ियों से प्रकृति के साथ तादात्म्य में जी रही है, लेकिन स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रही है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर चल रही कल्याणकारी योजनाओं की समीक्षा के लिए यह दौरा किया गया था।

वापसी के दौरान एक छोटे से गांव में लहलहाती मटर और आलू की फसलों ने उनका ध्यान खींचा। तभी एक बुजुर्ग व्यक्ति जोर-जोर से चिल्लाते हुए उनकी ओर आए। वे उलाहना दे रहे थे कि लंबे समय से मेड़ (पुलिया का गार्डवाल) बनाने की मांग कर रहे थे, लेकिन जब नहीं बना तो गांव वालों ने खुद श्रमदान से उसकी मरम्मत कर दी। इसी कारण DC की गाड़ी वहां तक पहुंच पाई।

बातों-बातों में पता चला कि यह बुजुर्ग निस्टर खेस कारगिल युद्ध में सेना में तैनात थे और उनके पैरों में गोली लगी थी, जिस कारण वे वॉकिंग स्टिक के सहारे चलते हैं। एक योद्धा जो देश की रक्षा के लिए सीमा पर लड़ा, आज उसी देश की मिट्टी से मेहनत से फसल उगा रहा है। कंचन सिंह ने उनके जज्बे को सलाम करते हुए हाथ जोड़कर प्रणाम किया और आशीर्वाद मांगा।

निस्टर खेस ने हंसते हुए कहा, “देखिए, आपको DC से डर लगता होगा, हम किसी से नहीं डरते।” उन्होंने यह भी सुना था कि यहां लेडीज DC हैं, जो सबकी बात सुनती हैं। कुछ दिनों बाद वे खुद मटर लेकर उनसे मिलने भी आए।

कंचन सिंह ने लिखा कि इस सुदूर क्षेत्र में भी यह खबर पहुंच गई है कि DC जनता की बात सुनती है, जो उनकी मेहनत की सफलता दर्शाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह “अबुआ राज” की संकल्पना का जीता-जागता उदाहरण है – जहां एक साधारण किसान बड़े अधिकारी को भी कठघरे में खड़ा करने से नहीं हिचकता। उसे अपने अधिकार, स्वामित्व और कर्तव्य का पूरा बोध है।

वे आगे लिखती हैं, “यही अधिकार बोध, स्वामित्व बोध और कर्तव्य बोध ही उत्तरदायी शासन व्यवस्था की कुंजी है। जब शासन और जनता साथ मिलकर समस्याओं को सुलझाती है, तभी सर्वांगीण विकास संभव होता है।”

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कंचन सिंह ने निस्टर खेस और उनके जैसे सभी लोगों को नमन किया, जो समावेशी गणतंत्र की स्थापना में योगदान दे रहे हैं। कल मुख्य समारोह में ऐसे ही लोगों को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है।

यह कहानी बताती है कि भारत का असली गणतंत्र गांव-गांव, किसान-किसान में बसता है – जहां एक पूर्व सैनिक आज भी मेहनत से देश का निर्माण कर रहा है और अपनी आवाज बुलंद करने से नहीं चूकता।

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