झारखंड में कुड़मी समाज का रेल रोको आंदोलन: आदिवासी दर्जे की पुरानी मांग को लेकर कई जगह ट्रेनें थमीं

झारखंड में कुड़मी समाज का रेल रोको आंदोलन: आदिवासी दर्जे की पुरानी मांग को लेकर कई जगह ट्रेनें थमीं

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झारखंड में कुड़मी समाज का रेल रोको आंदोलन: आदिवासी दर्जे की पुरानी मांग को लेकर कई जगह ट्रेनें थमीं

झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में फैले कुड़मी समाज ने अपनी लंबे समय से चली आ रही अनुसूचित जनजाति (एसटी) दर्जे की मांग को लेकर आज अनिश्चितकालीन ‘रेल टेका-डहर छेका’ आंदोलन शुरू कर दिया। सुबह से ही राज्य के कई रेलवे स्टेशनों पर प्रदर्शनकारियों ने पटरी जाम कर दीं, जिससे दर्जनों ट्रेनें प्रभावित हुईं। आंदोलन शांतिपूर्ण बताया जा रहा है, लेकिन रेलवे ने 100 से अधिक ट्रेनों के डायवर्शन या कैंसिलेशन की योजना बनाई है।

कुड़मी समाज का रेल रोको आंदोलन का झारखंड के सरायकेला-खरसावां, पश्चिमी सिंहभूम, रांची, धनबाद और चक्रधरपुर मंडल में सबसे ज्यादा असर देखने को मिल सकता है। मिली जानकारी के अनुसार सुबह 5 बजे से ही प्रदर्शनकारी पटरी पर उतर आए। रांची मंडल में 40 से अधिक स्टेशनों पर अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात हैं। चक्रधरपुर मंडल में अकेले 40 ट्रेनें बाधित हो सकती हैं। रेलवे सूत्रों के अनुसार, दक्षिण पूर्व रेलवे ने पहले ही कई ट्रेनें रद्द या रूट डायवर्ट कर दी हैं। यात्रियों को वैकल्पिक बस सेवाओं का सहारा लेना पड़ रहा है।

झारखंड में कुड़मी समाज का रेल रोको आंदोलन: आदिवासी दर्जे की पुरानी मांग को लेकर कई जगह ट्रेनें थमीं

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया और ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों में भी रेल रोको की सूचना है, लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट ने कल ही आंदोलन को ‘असंवैधानिक और अवैध’ घोषित कर दिया था। अदालत ने राज्य सरकार और रेलवे को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और आवश्यक सेवाओं (जैसे चिकित्सा और आपातकालीन) को बाधित न होने के निर्देश दिए।

झारखंड में कुड़मी समाज का रेल रोको आंदोलन: आदिवासी दर्जे की पुरानी मांग को लेकर कई जगह ट्रेनें थमीं

आंदोलन को आजसू पार्टी का समर्थन मिला है, जहां पूर्व विधायक लंबोदर महतो ने 24 जिलों में प्रभारी नियुक्त कर दिए। हालांकि, आदिवासी संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है और इसे ‘अवैध’ बता रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि इससे वास्तविक आदिवासियों के आरक्षण अधिकार प्रभावित होंगे। वे राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपने की तैयारी में हैं।

कुड़मी समाज, जो वर्तमान में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी में आता है, उनका दावा है कि 1931 की जनगणना में उन्हें एसटी का दर्जा दिया गया था, लेकिन 1950 में जारी नई सूची से उनका नाम हटा दिया गया। उनका कहना है कि हमें शिक्षा, नौकरी और आरक्षण में एसटी सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है। यह हमारा ऐतिहासिक अधिकार है। आंदोलन की शुरुआत दिल्ली के जंतर-मंतर पर 6 सितंबर को धरने से हुई थी, और आज यह तीनों राज्यों में एक साथ फैल गया।

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