जंगल, जल और जमीन से जुड़ी है सिमडेगा की अर्थव्यवस्था, संरक्षण की चुनौती बरकरार

सिमडेगा: जंगल, जल और जमीन सिमडेगा की प्राकृतिक पहचान के साथ-साथ यहां की अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद भी हैं। जिले के हजारों ग्रामीण परिवारों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। महुआ, लाह, साल बीज, इमली और अन्य वनोपज के संग्रह एवं बिक्री से ग्रामीणों को आमदनी होती है। वहीं पहाड़ियां, झरने, नदियां और हरियाली पर्यटन के जरिए रोजगार के अवसर पैदा करते हैं। हालांकि जंगलों में आग, अवैध कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन जैसी चुनौतियां पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों पर सवाल खड़े कर रही हैं।
वन सर्वेक्षण विभाग की *इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2023* के अनुसार सिमडेगा जिले में 1,246.51 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वन आवरण है, जो जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 33.03 प्रतिशत है। वहीं वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जिले की आबादी में अनुसूचित जनजाति की हिस्सेदारी करीब 70.8 प्रतिशत है। ऐसे में यहां के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन में जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों की अहम भूमिका है।
जिले के ग्रामीण और वनवर्ती इलाकों में महुआ फूल एवं बीज, डोरी, लाह, कुसुम बीज, साल बीज, साल पत्ते, इमली, आम, कटहल और जामुन जैसे वन उत्पाद आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इनके संग्रह, प्रसंस्करण और बाजार में बिक्री से ग्रामीण परिवारों को आमदनी होती है। खासकर महिलाओं और छोटे किसानों के लिए वनोपज आर्थिक सहारा है।
एक अध्ययन के अनुसार ठेठईटांगर क्षेत्र में सर्वेक्षण के दौरान कुछ परिवारों की कुल घरेलू आय में गैर-काष्ठ वन उत्पादों की हिस्सेदारी लगभग 24 प्रतिशत तक पाई गई थी। यह आंकड़ा बताता है कि जंगलों का संरक्षण केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों की आर्थिक सुरक्षा का भी सवाल है।

सिमडेगा की प्राकृतिक सुंदरता पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। केलाघाघ डैम, दनगद्दी, रामरेखा धाम समेत जिले के कई प्राकृतिक और धार्मिक स्थल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। पर्यटन गतिविधियों से स्थानीय दुकानदारों, वाहन चालकों और छोटे कारोबारियों को रोजगार मिलता है। पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखकर इन स्थलों का विकास किया जाए तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को और मजबूती मिल सकती है।
प्राकृतिक संपदा से समृद्ध होने के बावजूद सिमडेगा में जंगलों में आग, अवैध कटाई, वन्यजीवों के शिकार और प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। जंगलों के क्षरण का असर केवल पेड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे जलस्रोत प्रभावित होते हैं, मिट्टी की उर्वरता घटती है और जैव विविधता को नुकसान पहुंचता है। इसका सीधा असर उन ग्रामीण परिवारों पर भी पड़ता है, जिनकी आजीविका जंगलों पर निर्भर है।

ऐसे में केवल जागरूकता कार्यक्रमों से पर्यावरण संरक्षण का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। वन तस्करी पर प्रभावी कार्रवाई, आग की घटनाओं की रोकथाम, वन्यजीवों की सुरक्षा और जलस्रोतों के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। साथ ही ग्रामसभाओं, वन समितियों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी सुनिश्चित करनी होगी।
सिमडेगा में सड़क, भवन, पर्यटन और अन्य आधारभूत संरचनाओं के विकास के दौरान पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान रखना जरूरी है। प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाकर होने वाला विकास लंबे समय में जिले की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन दोनों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। सरकार और प्रशासन को पर्यावरण संरक्षण को केवल किसी विशेष दिवस के आयोजन तक सीमित रखने के बजाय सालभर की कार्ययोजना के रूप में लागू करना होगा।
जंगल सुरक्षित रहेंगे, जलस्रोतों का संरक्षण होगा और जमीन की उर्वरता बनी रहेगी, तभी सिमडेगा की प्राकृतिक संपदा के साथ यहां के हजारों परिवारों की आजीविका और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रह सकेगा।

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