जमशेदपुर: टाटा लीज नवीकरण से पहले विस्थापितों का बड़ा ऐलान, ‘पहले हमारे अधिकारों का समाधान करें, फिर लीज आगे बढ़ाएं
नीरज तिवारी
जमशेदपुर: जमशेदपुर में टाटा स्टील लीज नवीकरण की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे विस्थापित रैयतों का आंदोलन भी तेज होता जा रहा है। झारखंड मूलवासी अधिकार मंच के बैनर तले 18 मौजा के मूल रैयतों, खतियानधारी आदिवासियों और मूलवासी विस्थापितों ने एक बार फिर सरकार और जिला प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
विस्थापितों ने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी वर्षों पुरानी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक लीज नवीकरण की प्रक्रिया पर आगे बढ़ना अन्यायपूर्ण होगा।
क्या हैं विस्थापितों की प्रमुख मांगें?
झारखंड मूलवासी अधिकार मंच ने अपनी मांगों को लेकर सरकार को कड़ा रुख अपनाने की चेतावनी दी है। मंच की मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:
व्यापक सर्वे: टाटा कंपनी की स्थापना के दौरान अधिग्रहित की गई भूमि का नए सिरे से व्यापक सर्वे कराया जाए।
खतियान का आधार: वर्ष 1996 के सर्वे खतियान को पूरी तरह रद्द किया जाए और मूल पहचान के रूप में 1908 एवं 1937 के खतियान को मान्यता दी जाए।
पुनर्वास और रोजगार: विस्थापित प्रमाण पत्र जारी करने के साथ-साथ परिवार को उचित मुआवजा और युवाओं को नौकरी सुनिश्चित की जाए।
जमीन वापसी: जिन अधिग्रहित जमीनों का उपयोग कंपनी द्वारा नहीं किया जा रहा है, उन्हें वापस करने की प्रक्रिया शुरू हो।
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प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल
आंदोलनकारियों का आरोप है कि उन्होंने पूर्व में तत्कालीन उपायुक्त, पूर्वी सिंहभूम को जमीन से संबंधित आवश्यक दस्तावेज और खतियान की प्रतियां सौंपकर आवेदन दिया था। अब विस्थापित यह जानना चाहते हैं कि क्या जिला प्रशासन ने उस प्रस्ताव को राज्य सरकार के पास भेजा था?
मंच ने मांग की है कि यदि प्रस्ताव सरकार को भेजा गया है, तो उसे सार्वजनिक किया जाए ताकि विस्थापितों को वास्तविक स्थिति का पता चल सके।
आधिकारिक पत्राचार का हवाला
विस्थापितों ने अपनी मांगों को कानूनी आधार देते हुए राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के ज्ञापांक 07/विविध (जनावेदन)-24/2025 (दिनांक 11 दिसंबर 2025) तथा झारखंड मूलवासी अधिकार मंच के पत्रांक 1372/HM/2026 (दिनांक 10 फरवरी 2026) का हवाला दिया है।
सरकार से पारदर्शी कार्रवाई की मांग
मंच के पदाधिकारियों का कहना है कि टाटा लीज नवीकरण जैसे संवेदनशील विषय पर सरकार को पूर्ण पारदर्शिता बरतनी चाहिए। विस्थापित परिवारों का कहना है कि दशकों से वे न्याय की बाट जोह रहे हैं। अब समय आ गया है कि सरकार चुनावी वादों या प्रशासनिक औपचारिकता से ऊपर उठकर विस्थापितों के हक और अधिकार का सम्मान करे।
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