सिस्टम की शर्मनाक तस्वीर: बोकारो में अपनी जान जोखिम में डालकर ग्रामीणों ने बनाया बांस का पुल, इसी के सहारे करते है नदी पार

भूषण / बोकारो
बोकारो (बेरमो): 21वीं सदी के भारत में जहां एक ओर हाई-टेक बुनियादी ढांचे की बातें हो रही हैं, वहीं झारखंड के बोकारो जिले से आई एक तस्वीर प्रशासन के दावों की पोल खोल रही है। बेरमो विधानसभा क्षेत्र के अरमो पंचायत में हजारों ग्रामीण आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए ‘जुगाड़’ के भरोसे जी रहे हैं। यहाँ ग्रामीणों ने चंदा इकट्ठा कर और श्रमदान के जरिए कोनार नदी पर बांस का अस्थायी पुल तैयार किया है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!हर साल बह जाती है ‘उम्मीदों की डोरी’
अरमो पंचायत के नदीधार, नावाटांड, गंझु बस्ती, कुसुमडीहा और शहरटोला जैसे गांवों की हजारों की आबादी के लिए कोनार नदी पार करना किसी जंग से कम नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि:
हर साल ग्रामीण अपनी जेब से पैसे जुटाकर बांस का पुल बनाते हैं।
मानसून की पहली बारिश आते ही यह पुल नदी की धार में बह जाता है।
पुल बहने के बाद बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और मरीजों को अस्पताल ले जाना असंभव हो जाता है।
प्रशासन का तर्क है कि कुछ दूरी पर पक्का पुल मौजूद है, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार वह दूरी इतनी अधिक है कि दैनिक आवाजाही के लिए व्यावहारिक नहीं है।
नल-जल योजना बनी ‘शोपीस’, नदी का पानी ही सहारा
सिर्फ रास्ता ही नहीं, प्यास बुझाना भी यहाँ एक चुनौती है। सरकार की महत्वाकांक्षी नल से जल’ योजना इस पंचायत में मजाक बनकर रह गई है। कागजों पर पाइपलाइन बिछ चुकी है और घरों के बाहर नल भी लग गए हैं, लेकिन उनमें पानी महीनों में एक बार दर्शन देता है।
मजबूरी की इंतहा:
पानी न मिलने के कारण ग्रामीण कोनार नदी के किनारे चुवां’ (रेत में गड्ढा) खोदकर गंदा और दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। इससे क्षेत्र में जलजनित बीमारियों का खतरा लगातार बना रहता है।
फंड के अभाव में अटकी फाइलें
जब इस बदहाली को लेकर विभाग से संपर्क किया गया, तो स्पेशल डिवीजन के अभियंता ने रटा-रटाया जवाब देते हुए कहा कि पुल के लिए DPR (Detailed Project Report) तो तैयार है, लेकिन बजट और फंड की कमी के कारण काम शुरू नहीं हो सका है।
आंदोलन की चेतावनी
ग्रामीणों में अब व्यवस्था के खिलाफ भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि अगर जल्द ही पक्के पुल का निर्माण और पानी की सुचारू व्यवस्था नहीं की गई, तो वे उग्र आंदोलन को विवश होंगे। ग्रामीणों ने सवाल उठाया है—
“क्या हमारे जीवन की कोई कीमत नहीं है? चुनाव के समय वोट मांगने वाले नेता अब कहाँ गायब हैं?”
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