32 मन सोने की प्रतिमा, हाथी के न उठने से जुड़ी है कहानी; झारखंड का श्रीबंशीधर धाम क्यों कहलाता है ‘दूसरा मथुरा-वृंदावन’?
गढ़वा: झारखंड के पश्चिमी छोर पर स्थित गढ़वा जिले का श्रीबंशीधर नगर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और आस्था का प्रमुख केंद्र है। बांकी यानी राधा रानी नदी के तट पर बसे इस नगर की पहचान भगवान श्री बंशीधर के उस भव्य मंदिर से है, जहां श्री राधा रानी के साथ भगवान श्रीकृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा में विराजमान अद्भुत प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। मंदिर में विराजमान भगवान श्री बंशीधर की प्रतिमा को 32 मन शुद्ध सोने की प्रतिमा बताया जाता है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!शेषनाग के ऊपर कमल पर विराजमान हैं बंशीधर
श्रीबंशीधर मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण शेषनाग के ऊपर कमल पुष्प पर त्रिभंगी मुद्रा में वंशीवादन करते हुए विराजमान हैं। भगवान की इस अनुपम छवि के दर्शन के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के बीच यह मान्यता है कि भगवान श्री बंशीधर स्वयं इस धरती पर पधारे थे।
इसी मान्यता के कारण श्रीबंशीधर नगर को योगेश्वर श्रीकृष्ण की भूमि कहा जाता है। धार्मिक आस्था रखने वाले कई लोग इस स्थान को मथुरा-वृंदावन के बाद कृष्ण भक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र मानते हैं।

रानी शिवमानी को सपने में मिले थे भगवान श्रीकृष्ण
श्रीबंशीधर धाम के इतिहास से जुड़ी मान्यता करीब दो सौ वर्ष पुरानी है। बताया जाता है कि राजा भवानी सिंह देव के निधन के बाद उनकी धर्मपरायण पत्नी रानी शिवमानी देवी ने राजकाज संभाला। रानी भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं।
मान्यता के अनुसार जन्माष्टमी के व्रत के दौरान 14 अगस्त 1827 की मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने रानी शिवमानी देवी को स्वप्न में दर्शन दिए। भगवान ने रानी से वर मांगने को कहा। रानी ने अपने लिए कुछ मांगने के बजाय भगवान की कृपा हमेशा बनी रहने की प्रार्थना की।
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने रानी को कनहर नदी के किनारे महुअरिया के समीप शिव पहाड़ी में अपनी प्रतिमा दबे होने की जानकारी दी और उसे वहां से अपने राज्य में लाने का निर्देश दिया।
खुदाई में मिली भगवान बंशीधर की प्रतिमा
भगवान की इस आज्ञा को रानी ने उनकी कृपा माना। इसके बाद वह शिव पहाड़ी पहुंचीं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर खुदाई कराई गई। खुदाई के दौरान भगवान श्री बंशीधर की अद्भुत प्रतिमा मिलने की बात कही जाती है।
प्रतिमा को हाथियों के जरिए श्रीबंशीधर नगर लाया जा रहा था। लेकिन जब प्रतिमा गढ़ के मुख्य द्वार के पास पहुंची तो उसे लेकर चल रहा अंतिम हाथी अचानक बैठ गया।
काफी प्रयास के बावजूद हाथी वहां से नहीं उठा। इसके बाद रानी ने राजपुरोहितों से विचार-विमर्श किया। इस घटना को भगवान की इच्छा मानते हुए उसी स्थान पर मंदिर निर्माण कराने का निर्णय लिया गया।
21 जनवरी 1828 को राधा-बंशीधर की हुई स्थापना
इसके बाद वाराणसी से श्री राधा रानी की अष्टधातु की प्रतिमा मंगाई गई। 21 जनवरी 1828 को भगवान श्री बंशीधर के साथ श्री राधा रानी की विधिवत स्थापना कराई गई।
समय के साथ यह स्थान श्री बंशीधर धाम के रूप में प्रसिद्ध होता गया। आज मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु राधा-बंशीधर की मनमोहक छवि को आस्था और भक्ति के साथ निहारते हैं।
जन्माष्टमी पर बढ़ जाती है धाम की रौनक
जन्माष्टमी के मौके पर श्रीबंशीधर धाम में विशेष आयोजन होते हैं। वृंदावन से आने वाली रासलीला और अयोध्या से पधारे आचार्यों द्वारा कथा वाचन श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रहता है।
मंदिर प्रबंधन के मुताबिक जन्माष्टमी के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। धार्मिक आयोजन के साथ मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहता है।
श्रीबंशीधर धाम को कॉरिडोर बनाने की मांग
श्रीबंशीधर धाम को धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की मांग भी उठ रही है। मंदिर के ट्रस्टी सह नगरगढ़ के युवराज राजा राजेश प्रताप देव का कहना है कि हर वर्ष जन्माष्टमी का पर्व विशेष रूप से मनाया जाता है और देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां आते हैं। धाम को विकसित करने के लिए सरकार से कॉरिडोर बनाने की मांग की जा रही है।
वरिष्ठ पत्रकार धीरेन्द्र चौबे के अनुसार श्रीबंशीधर नगर के लोगों के लिए यह गौरव की बात है कि भगवान श्रीकृष्ण के चरण इस धरती पर पड़े। उनका कहना है कि वृंदावन के बाद गढ़वा में श्री बंशीधर की विशेष धार्मिक महत्ता है।
वहीं मंदिर के संरक्षक, नगरगढ़ के सदस्य और जेएमएम विधायक ने भी धाम के विकास को लेकर पहल करने की बात कही है। उनका कहना है कि भगवान की इस भूमि को किस तरह विकसित किया जाए, इसको लेकर बैठक कर निर्णय लिया जाएगा और जल्द ही इसका परिणाम सामने आएगा।
आस्था के साथ पर्यटन की भी बड़ी संभावना
श्रीबंशीधर धाम की पहचान केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। करीब दो शताब्दी पुरानी मान्यताओं, भगवान श्रीकृष्ण की अनूठी प्रतिमा और जन्माष्टमी के विशेष आयोजनों के कारण यहां धार्मिक पर्यटन की भी बड़ी संभावना है।
अगर श्रीबंशीधर धाम को बेहतर सड़क, यात्री सुविधाओं, ठहरने की व्यवस्था, मंदिर परिसर के विकास और आसपास के धार्मिक स्थलों को जोड़कर विकसित किया जाता है तो यह झारखंड के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में अपनी जगह और मजबूत कर सकता है।

















