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Ranchi News:-नीतीश कुमार के विपक्षी गठबंधन के प्रयास में अपना चेहरा चमका सकता है झामुमो, परंतु उसका हिस्सा बनना मुश्किल

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प्रेरणा चौरसिया

Drishti  Now  Ranchi

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार देश की बीजेपी विरोधी पार्टियों को एक साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं. इस प्रयास में वे पहले ही कई अन्य दलों के नेताओं और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मिल चुके हैं. बुधवार को उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से भी बात की.

बातचीत का लब्बोलुआब यही रहा कि अभी और भी बात होगी। इससे स्पष्ट है कि विपक्षी एकता का यह प्रयास अभी प्रारंभिक चरण में है। इसके लिए अभी और भी पापड़ बेलने होंगे। क्षेत्रीय दलों की इच्छा, आकांक्षा को शांत करना होगा। उनकी राजनीतिक मजबूरी की राह में खड़े रोड़े को हटाना होगा, पर यह झारखंड में भी आसान नहीं है।

कांग्रेस के बारे में स्थिति स्पष्ट किए बगैर यह सब झारखंड में भी संभव नहीं है। इस लिहाज से झामुमो विपक्षी गठबंधन एकता के बहाने चेहरा चमका सकता है, वैचारिक समर्थन दे सकता है, लेकिन लोकसभा चुनाव में जमीनी स्तर पर होनेवाले गठबंधन का हिस्सा नहीं बन सकता। क्योंकि झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार कांग्रेस की ही वैशाखी पर टिकी है। इसलिए कांग्रेस को किनारे कर नीतीश कुमार झामुमो को अपने गठबंधन में नहीं ला सकते। यह झामुमो की मजबूरी भी है, जरूरी भी।

झामुमो को कांग्रेस और जदयू में से किसी एक को चुनना होगा

विपक्षी गठबंधन तब तक मजबूत नहीं हो सकता, जब तक चुनाव के समय जमीनी स्तर पर मजबूत गठबंधन न हो। और यह झारखंड में असंभव दिखता है। क्योंकि झामुमो के लिए कांग्रेस और जदयू में से किसी एक को चुनना होगा। कांग्रेस और जदयू के साथ गठबंधन की स्थिति में जदयू के लिए सीट छोड़नी होगी। यह अहम विवाद का विषय होगा। इससे पहले तो यह तय करना होगा कि झामुमो नीतीश कुमार के विपक्षी गठबंधन के नेता को पीएम का चेहरा मानेगा या कांग्रेस के किसी नेता को।

झारखंड में बिखर चुका है जदयू का वोट बैंक : झारखंड गठन के समय यहां की राजनीति में जदयू का एक अहम स्थान था। पहले मुख्यमंत्री बने बाबूलाल मरांडी की सरकार में जदयू के लालचंद महतो, रमेश सिंह मुंडा, रामचंद्र केसरी और मधु सिंह, चार-चार मंत्री थे। बाद में जदयू का जनाधार बिखरता गया। यह कुछ आजसू पार्टी की तरफ और कुछ भाजपा व अन्य दलों की ओर खिसक गया। 2014, 2019 के विधानसभा चुनाव में तो जदयू से कोई विधायक भी नहीं बना।

 

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