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झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने झारखंड में संवैधानिक संस्थाओं के खाली पदों पर सवाल उठाए ।  राज्य सूचना आयोग, लोकायुक्त और राज्य महिला आयोग निष्क्रिय

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने झारखंड में संवैधानिक संस्थाओं के खाली पदों पर सवाल उठाए ।  राज्य सूचना आयोग, लोकायुक्त और राज्य महिला आयोग निष्क्रिय
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया की  झारखंड में कई महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था जैसे राज्य सूचना आयोग, लोकायुक्त और राज्य महिला आयोग में लंबे समय से अध्यक्ष और सदस्यों के पद खाली पड़े हैं। इस स्थिति ने इन संस्थाओं को निष्क्रिय बना दिया है, जिसका असर आम नागरिकों, विशेष रूप से सूचना के अधिकार (RTI), भ्रष्टाचार विरोधी शिकायतों और महिला उत्पीड़न से संबंधित मामलों पर पड़ रहा है।

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बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया की झारखंड राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और छह सूचना आयुक्तों के सभी पद मई 2020 से खाली हैं, जब आखिरी सूचना आयुक्त हिमांशु शेखर चौधरी सेवानिवृत्त हुए। जिसके कारण, आयोग में कोई सुनवाई नहीं हो रही है, आयोग में लगभग 16,000 अपील और शिकायतें लंबित हैं। हर महीने 450-500 नई अपीलें आती हैं, लेकिन मुख्य सूचना आयुक्त की अनुपस्थिति में कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
जाहिर है 2020 में झारखंड सरकार ने इन पदों के लिए विज्ञापन निकाला था, और लगभग 300 आवेदन प्राप्त हुए थे।  सुप्रीम कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट ने इस पर कड़ी टिप्पणी की है और सरकार को नियुक्तियां करने का निर्देश दिया है। हाल ही में, 6 फरवरी 2025 को झारखंड हाईकोर्ट ने सरकार को दो सप्ताह में मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति पूरी करने का आदेश दिया।

मरांडी ने आरोप लगाया की झारखंड में लोकायुक्त का पद फरवरी 2022 से खाली है, जिसके कारण भ्रष्टाचार और लोक शिकायतों से संबंधित लगभग 3,000 मामले लंबित हैं। लोकायुक्त कार्यालय में नई शिकायतों पर समन जारी करने या रिपोर्ट मंगाने जैसे कार्य पूरी तरह ठप हैं।

बाबुलाल मरांडी ने हेमंत सरकार पर आरोप लगाया की राज्य में पीड़ित महिलाओं की सुनवाई रुकी हुई है।
राज्य महिला आयोग में भी अध्यक्ष और सदस्यों के पद खाली होने के कारण महिला उत्पीड़न से संबंधित शिकायतों की सुनवाई पूरी तरह बंद है। यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि पीड़ित महिलाएं अपनी शिकायतें दर्ज कराने के लिए आयोग पर निर्भर रहती हैं। खाली पदों के कारण आयोग निष्क्रिय हो गया है, जिससे महिलाओं के अधिकारों की रक्षा में बाधा उत्पन्न हो रही है।

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