पलामू: वन विभाग की टीम पर ग्रामीणों का हमला, दो वनकर्मी घायल, कई सवाल उठे

पलामू: वन विभाग की टीम पर ग्रामीणों का हमला, दो वनकर्मी घायल, कई सवाल उठे

पलामू: वन विभाग की टीम पर ग्रामीणों का हमला, दो वनकर्मी घायल, कई सवाल उठे

स्थान : बंशीखुर्द, मनातू थाना क्षेत्र, पलामू, झारखंड
तारीख : 9 जुलाई  बुधवार की रात
घटना का विवरण
पलामू जिले के मनातू थाना क्षेत्र के बंशीखुर्द गांव में वन विभाग की एक टीम वन भूमि पर अतिक्रमण हटाने के लिए पहुंची थी। इस दौरान स्थानीय ग्रामीणों ने टीम पर लाठी-डंडों से हमला कर दिया। हमले में दो वनकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए, और वन विभाग की गाड़ी क्षतिग्रस्त कर दी गई। ग्रामीणों ने जब्त किए गए एक ट्रैक्टर को भी छुड़ा लिया। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सभी वनकर्मियों को सुरक्षित बाहर निकाला। घायल वनकर्मियों का इलाज मेदिनीनगर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल (MMCH) में चल रहा है। घटना के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और हमलावरों की तलाश में छापेमारी शुरू कर दी है।[](

घटना का पृष्ठभूमि
अतिक्रमण का मामला : वन विभाग की टीम को सूचना मिली थी कि बंशीखुर्द गांव में वन भूमि पर अवैध जुताई और अतिक्रमण हो रहा था। फॉरेस्टर राजेश गुप्ता के नेतृत्व में टीम ने जांच की, जिसमें पाया गया कि यह गतिविधि स्थानीय राजकीय चौकीदार के संरक्षण में हो रही थी।

वनकर्मियों की वेशभूषा पर सवाल
आधा ड्रेस में वनकर्मी : घटना के बाद यह सवाल उठा कि वनकर्मी आधा ड्रेस (कुछ धोती-कुर्ता में) क्यों थे। स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया पर चर्चा है कि क्या वन विभाग इतनी जल्दबाजी में था कि कर्मचारियों ने अपनी वर्दी पहनना भूल गए? यह असामान्य है, क्योंकि वन विभाग के कर्मचारियों को आमतौर पर आधिकारिक वर्दी में कार्रवाई के लिए जाना चाहिए, जो उनकी पहचान  है।
संभावित कारण
– यह संभव है कि वनकर्मी रात के समय गुप्त कार्रवाई के लिए गए हों, और वर्दी न पहनने का निर्णय जानबूझकर लिया गया हो ताकि उनकी मौजूदगी कम ध्यान आकर्षित करे।
हालांकि कुछ लोग इसे लापरवाही या अनुशासनहीनता के रूप में देख रहे हैं, जो वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है।

बिना स्थानीय पुलिस के छापेमारी
प्रक्रिया पर सवाल : एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वन विभाग ने रात के समय, स्थानीय पुलिस बल को साथ लिए बिना जंगल में छापेमारी क्यों की। सामान्य प्रक्रिया के अनुसार, संवेदनशील क्षेत्रों में ऐसी कार्रवाइयों के लिए पुलिस सहायता अनिवार्य होती है, विशेष रूप से जब ग्रामीणों के साथ टकराव की संभावना हो।

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