ऐसे थे मार्क….दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार प्रिय प्रकाश की कलम से -संस्मरण
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

प्रिय प्रकाश
वरिष्ठ पत्रकार
ऐसे थे मार्क….दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार प्रिय प्रकाश की कलम से -संस्मरण

——————-
बात 2001 की है। तब मैं दिल्ली के एक अखबार में काम करता था। जनवरी का महीना था, मुझे अचानक कुंभ कवरेज के लिए इलाहाबाद जाने को कहा गया। यह 21 वीं सदी का पहला कुंभ मेला था।
मुझे कुंभ के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी लेकिन जीवन में पहली बार बाहर का असाइनमेंट मिलने से काफी उत्साहित था।
जनवरी का पहला हफ्ता रहा होगा। मेले की शुरुआत हो चुकी थी। समय कम था। मैं भागा भागा दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित सूचना आयुक्त के दफ्तर पहुंचा और मेला क्षेत्र में रहने का इंतजाम करने का अनुरोध किया लेकिन मुझे निराशा हाथ लगी।
मुझे साफ साफ कह दिया गया अब देर हो चुकी है। मीडिया कैंप में सारे टैंट फुल हो चुके हैं रहने के लिए कही जगह नहीं। मैं काफी मिन्नतें करता रहा आखिर में एक पत्र देने के लिए राजी हो गए।
अगले दिन पत्र लेकर रात की ट्रेन से बिना रिजर्वेशन के मै इलाहाबाद रवाना हो गया।
16 जनवरी का शायद वो दिन था, सुबह मैं इलाहाबाद पहुंचा। मुझे इस बात का तनिक भी आभास नहीं था कि स्टेशन में उतरते ही बड़ी भीड़ का सामना होगा।
चूंकि मेरे पास पत्र था इसलिए मैं आश्वस्त था कि प्रशासन की तरफ से मेला क्षेत्र तक जाने का इंतजाम कर दिया जाएगा। लेकिन मेरे लिए यह बड़े सदमे से कम नहीं था जब मुझे कहा गया ट्रैफिक बंद है वहां तक की दूरी पैदल ही तय करना होगा।
करीब 5 किलोमीटर की दूरी मैं पैदल ही निकल पड़ा और रास्ते भर उस घड़ी को कोसता रहा जब वहां जाने का फैसला लिया था। यात्रा के दौरान वह दृश्य किसी रिफ्यूजी जैसा ही लग रहा था जहां हर कोई गठरी उठाए चलता जा रहा था।
खैर, मेला क्षेत्र स्थित मीडिया कैंप पहुंचकर पत्र दिखाते हुए मैने रहने का इंतजाम करने का अनुरोध किया। मुझे टका सा जवाब मिल गया, कुछ भी नहीं हो सकता। एक सप्ताह पहले से ही सभी टैंट फुल हो चुके हैं । मैने महसूस किया कई और पत्रकार आए हुए थे सभी को यही बताया जा रहा था। कई लोग लौट रहे थे, मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था मैं वहीं बैठ गया। मीडिया कैंप से लैंड लाइन फोन से दिल्ली ऑफिस समेत कई जगह फोन घुमाया लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला।
शाम 4 बजे के करीब मुझे बताया गया कि पास में स्थित टैंट में बीबीसी के मार्क टली ठहरे हुए हैं आप उनसे बात कर लें अगर वह इजाजत दे दें तो आपका काम हो जाएगा।
मार्क टली का नाम सुनकर ही मैं उछल पड़ा था, बचपन से यही नाम सुनता आया था,हर दिन शाम साढ़े सात बजे और सुबह में ट्रांजिस्टर पर बीबीसी सुनने का जुनून जो था ।
किसी भी पत्रकार के लिए उनसे मिलना सपने से कम नहीं था, डर भी रहा था कि उनसे बात कैसे की जाए ? अगर उन्होंने मना कर दिया तो… ?
मैं समान उठा कर उस ओर लपक गया। टैंट ने जाकर पता चला कि मार्क साहेब फील्ड में निकले हुए हैं। मैं वहीं इंतजार करने लगा, शाम ढलने वाली थी और मेरी उम्मीद भी टूटने लगी थी। मुझे पता चला कि मार्क साहेब के साथ एक महिला पत्रकार भी उसी टैंट में हैं। यह जानकर मैं मान बैठा था कि मुझे फिर निराशा ही हाथ लगने वाली है।
शाम करीब 6 बजे थोड़ी हलचल हुई, मार्क साहेब लौटे थे वह मुझे वहां बैठा देख एक क्षण रुके और फिर कुछ कहे सीधे टैंट के अंदर चले गए।
मुझे कुछ कहने का साहस नहीं हुआ फिर से इंतजार करने लगा।
थोड़ी ही देर बाद वह बाहर निकले और हिंदी में बड़े सहज भाव से मुझसे मेरा नाम और आने का प्रयोजन पूछा। मैं एक सांस में दिल्ली से लेकर इलाहाबाद तक की कहानी बता दिया साथ ही यह भी बताना नहीं भूला कि अगर मुझे रहने की इजाजत मिल जाए तो यह सपने पूरा होने जैसा होगा। मार्क साहब ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,” प्रिय आप यहां रह सकते हैं।”
मार्क साहब ने अपनी साथी गिलियन राइट (Gillian wright) से भी मेरा परिचय कराया और मेला प्रशासन से मेरे लिए चारपाई और बिस्तर का इंतजाम करने को कहा।
रात भर मैं मेले की रिपोर्टिंग से इतर यही सोचता रहा कि मार्क साहब से क्या क्या बात पूछनी है, उनके साथ कैसे वक्त गुजारना है। सुबह जब आंख खुली तो मार्क साहेब नजर नहीं आए, पूछने पर पता चला वह तड़के फील्ड में निकल चुके हैं। मेरे पास अफसोस करने के सिवाय बचा भी क्या था।
मेला घूमने के बाद दोपहर में जब मै कैंप वापस लौटा तो थोड़ी ही देर में धूल से लथपथ मार्क साहेब भी लौटे। संक्षिप्त वार्तालाप में मुझे पता चला कि वह शाम में फिर वो फील्ड में जाने वाले हैं। इस बार मैं तैयार बैठा था। मार्क साहब जब निकले तो मैं भी उनके पीछे पीछे चल पड़ा। इस बात का ध्यान रखा कि उन्हें इसका पता नहीं चले।
वह संगम तट पर जा पहुंचे और रेत के टीलेनुमा जगह पर बैठकर वहां के नज़ारे को निहारते और फिर की बोर्ड पर टाइप करते। मैं दूर खड़ा उन्हें देखता रहा।
दो दिन के साथ में मैने महसूस किया कि वो फील्ड में घूमने में माहिर थे। आस पास की हर गतिविधियों पर पैनी नजर रखते थे और बिना लाग लपेट के आंखों देखी हर बात अपनी रिपोर्ट में शामिल करते थे। उनकी रिपोर्टिंग में तथ्यात्मक प्रमाणिकता के साथ गहरा शोध भी होता था। दिन भर घुमक्कड़ की तरह भटकते और रात में अध्ययन करते। भारतीय साहित्य, संस्कृति और राजनीति के बारे में उन्हें जितना ज्ञान था वैसा कम ही देखने की मिलता है।
मार्क टली ने कुंभ का कई बार कवरेज किया और बाद में उन्होंने पूरा अध्याय भी लिखा है।
2001 के कुंभ में गिलियन राइट के साथ गए यात्रा का जिक्र भी उन्होंने किया है मार्क लिखते हैं कि ” 2001 के कुंभ को लेकर बीबीसी शुरू में उत्साहित नहीं था उन्हें लग रहा था कि यह सिर्फ धार्मिक आयोजन है, अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों या पाठकों के लिए बहुत उपयोगी नहीं होगा।” लेकिन मार्क टली ने इसे झुठला दिया।
मार्क तब सही थे और दूरदर्शी भी थे तभी तो पिछले साल प्रयागराज में संपन्न हुए कुंभ ने 60 से भी ज्यादा देशों से करीब 55 लाख विदेशी पर्यटक मेला पहुंचे। आज पूरा विश्व कुंभ के बारे में जानने लगा है।
मार्क टली से वो पहली और अंतिम मुलाक़ात थी। इस बात का अफसोस हमेशा रहेगा कि फिर कभी मिलने की कोशिश नहीं की, अगर करता तो मार्क ज़रूर मिलते क्योंकि वह मार्क टली थे।

















