रांची का ‘सुगनू’ गांव: जहां गैस सिलेंडर की किल्लत बेअसर, हर चौखट पर सजी लकड़ियों ने लिखी आत्मनिर्भरता की नई कहानी
रांची का ‘सुगनू’ गांव: जहां गैस सिलेंडर की किल्लत बेअसर, हर चौखट पर सजी लकड़ियों ने लिखी आत्मनिर्भरता की नई कहानी

रिक्की राज
रांची: राजधानी रांची से सटे सुगनू गांव में इन दिनों एक अलग ही तस्वीर देखने को मिल रही है। यह तस्वीर किसी धुएं या प्रदूषण की नहीं, बल्कि ग्रामीणों की दूरदर्शिता और स्वावलंबन की है। जहां एक ओर शहरों में रसोई गैस सिलेंडर के लिए मारामारी मची है और लोग लंबी कतारों में खड़े हैं, वहीं सुगनू गांव ने इस संकट का समाधान अपने घर की चौखट पर ही ढूंढ लिया है।
हर आंगन में ‘ईंधन का बैंक’
गांव में कदम रखते ही सबसे पहले लकड़ियों के ऊंचे-ऊंचे ढेर नजर आते हैं। क्या घर की छत, क्या आंगन और क्या दरवाजे का कोना—हर जगह सलीके से सजाई गई लकड़ियों का भंडार दिखाई देता है। दरअसल, गैस की बढ़ती कीमतों और अनियमित आपूर्ति ने ग्रामीणों को इस कदर सतर्क कर दिया है कि उन्होंने आने वाले पूरे साल के लिए जलावन का इंतजाम पहले ही कर लिया है।
अनिश्चितता ने सिखाया सबक
ग्रामीणों का कहना है कि गैस सिलेंडर का कोई भरोसा नहीं रह गया है। कभी समय पर मिलता है, तो कभी हफ्तों इंतजार करना पड़ता है। इसी अनिश्चितता से बचने के लिए पूरे गांव ने सामूहिक रूप से एक ‘मुहिम’ चलाई। परिवार के हर सदस्य ने मिलकर आसपास के जंगलों और सेना कैंप के नजदीकी इलाकों से सूखी टहनियां और गिरे हुए पेड़ इकट्ठा किए। आज नतीजा यह है कि हर घर के पास अपना पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।
पर्यावरण और परंपरा का अनूठा तालमेल
सुगनू गांव की सबसे खास बात यह है कि आत्मनिर्भर बनने की इस दौड़ में उन्होंने कुदरत को नुकसान नहीं पहुंचाया। ग्रामीण बताते हैं कि वे केवल सूखी और बेकार पड़ी लकड़ियों का ही उपयोग करते हैं; हरे-भरे पेड़ों को काटना यहां सख्त मना है। इस तरह उन्होंने जरूरत और पर्यावरण के बीच एक बेहतरीन संतुलन कायम किया है।
अब रसोई गैस पर निर्भरता कम
गांव की रसोई का पूरा सिस्टम अब लकड़ी के चूल्हों पर शिफ्ट हो गया है। हालांकि कई घरों में गैस कनेक्शन आज भी मौजूद हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल अब केवल आपातकालीन स्थिति या बहुत जरूरी होने पर ही किया जाता है। ग्रामीणों का साफ मानना है कि जब उनके पास मुफ्त और पर्याप्त पारंपरिक ईंधन मौजूद है, तो वे महंगे और अनिश्चित विकल्पों पर क्यों निर्भर रहें?

शहरों के लिए एक बड़ा संदेश
आज जब आधुनिक तकनीक और सुविधाओं के बीच शहरों में हाहाकार मचा है, तब सुगनू गांव की यह ‘लकड़ी बैंक’ वाली तस्वीर हमें सोचने पर मजबूर करती है। यह गांव सिखाता है कि संकट आने से पहले किया गया प्रबंधन ही असली सुरक्षा है।

















