The painful story of a laborer from Jharkhand

झारखंड के एक मजदूर की दर्दनाक दास्ताँ ..फर्जी पहचान, असली मौत

The painful story of a laborer from Jharkhand

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दुमका का वह सूना आँगन शिकारीपाड़ा के आमड़ाडोभा गाँव मे दो दिनों से चूल्हा नहीं जला है। 34 वर्षीय परमेश्वर लोहार के घर से सिर्फ चीखें सुनाई दे रही हैं। जिस बेटे को परिवार ने इस उम्मीद में विदा किया था कि वह कश्मीर की वादियों से खुशहाली लेकर लौटेगा, उसी की मौत की खबर ने परिवार को तोड़कर रख दिया है।

साजिश ऐसी कि रूह कांप जाए

इस मामले में जो सबसे वीभत्स पहलू सामने आया है, वह है बिचौलियों (मेठ) की क्रूरता। आरोप है कि मेठ कासिम अंसारी ने परमेश्वर को काम पर ले जाने के लिए उसके मृत भाई के आधार कार्ड का सहारा लिया। एक मरे हुए इंसान के दस्तावेज पर परमेश्वर की तस्वीर चिपकाकर उसे ‘जिंदा’ दिखाया गया, ताकि उसे बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (BRO) जैसे दुर्गम इलाकों में काम पर लगाया जा सके।

विभाजन की पराकाष्ठा:

जिस भाई को परिवार ने पहले ही खो दिया था, उसी की पहचान ओढ़कर परमेश्वर मौत के मुँह में चला गया। अब कागजों पर वह कौन है और असल में कौन मरा है, यह उलझन उस गरीब परिवार के लिए पहाड़ जैसी बन गई है।

गरीबी का क्रूर चेहरा

बेबसी की इंतहा देखिए—परिवार के पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वे कश्मीर से अपने लाडले का शव वापस दुमका ला सकें। एक पिता, एक भाई और एक बेटा वहां बर्फ की वादियों में अकेला पड़ा है, और यहाँ उसका परिवार प्रशासन के सामने हाथ फैलाए खड़ा है कि बस एक बार उसका अंतिम दर्शन करा दिया जाए।

पलायन का अंतहीन सिलसिला

यह सिर्फ परमेश्वर की कहानी नहीं है। दुमका और संथाल परगना के हजारों आदिवासी युवा हर साल इसी तरह सुनहरे भविष्य के झांसे में बाहरी राज्यों की ओर रुख करते हैं। ये बिचौलिए उन्हें महज एक ‘संख्या’ समझते हैं। जब तक हाथ चलते हैं, वे मजदूर हैं; और जब सांसें रुक जाती हैं, तो वे लावारिस लाश बन जाते हैं।

प्रशासनिक दिलासा और सुलगते सवाल

हालांकि प्रशासन ने शव लाने और मुआवजे का आश्वासन दिया है, लेकिन सवाल वही है:
क्या मुआवजे की रकम उस माँ के आंसू पोंछ पाएगी जिसका बेटा फर्जी पहचान के साये में चला गया?

कब तक बिचौलिए गरीबों की जिंदगी से यह खूनी खेल खेलते रहेंगे?

परमेश्वर की मौत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या विकास की दौड़ में हमारे गाँव के ये मजदूर इतने पीछे छूट गए हैं कि उन्हें अपनी पहचान तक गिरवी रखनी पड़ रही है?

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