Women Will Become Self-Reliant Through a Decentralized Production Model – Kalpana Soren

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई उम्मीद: विकेन्द्रित उत्पादन मॉडल से आत्मनिर्भर बनेंगी महिलाएं – कल्पना सोरेन

Women Will Become Self-Reliant Through a Decentralized Production Model – Kalpana Soren

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रांची: गांडेय की विधायक और झारखंड विधानसभा की महिला एवं बाल विकास समिति की सभापति श्रीमती कल्पना सोरेन ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए ‘विकेन्द्रित उत्पादन’ (Distributed Production) प्रणाली को अपनाए जाने पर जोर दिया है। हाल ही में महाराष्ट्र के सफल मॉडलों के अध्ययन के बाद उन्होंने इसे झारखंड में लागू करने की दिशा में एक नई बहस छेड़ दी है।

लिज्जत पापड़ से मिली प्रेरणा

मुंबई में ‘श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़’ और ‘डब्बावाला इंटरनेशनल एक्सपीरियंस सेंटर’ के कामकाज का बारीकी से निरीक्षण करने के बाद कल्पना सोरेन ने इसे महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि लिज्जत पापड़ केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि एक सहकारी आंदोलन है, जिसने लाखों महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका दी है।

क्या है ‘विकेन्द्रित उत्पादन’ मॉडल?

विधायक कल्पना सोरेन के अनुसार, यह प्रणाली ग्रामीण महिलाओं के लिए वरदान साबित हो सकती है, क्योंकि:

स्थानीय स्तर पर रोजगार: महिलाएं अपने घर के पास रहकर ही काम कर सकती हैं।

पारिवारिक संतुलन: घर और बच्चों की जिम्मेदारियों के साथ आर्थिक स्वतंत्रता पाना संभव होता है।

पारंपरिक कौशल का सम्मान:बस्थानीय कला और संसाधनों का व्यावसायिक उपयोग हो पाता है।

किन क्षेत्रों में लागू हो सकता है यह मॉडल?

श्रीमती सोरेन ने स्पष्ट किया कि इस मॉडल को केवल एक उद्योग तक सीमित न रखकर इसे व्यापक बनाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से तीन क्षेत्रों को रेखांकित किया:

1. हस्तशिल्प: स्थानीय कारीगरों को सीधे बाजार से जोड़ना।

2. खाद्य प्रसंस्करण: कृषि उत्पादों का स्थानीय स्तर पर मूल्यवर्धन (Value Addition) करना।

3. लघु उद्योग: छोटे स्तर पर उत्पादन इकाइयां स्थापित कर आत्मनिर्भरता बढ़ाना।

सरकार और संस्थानों से समन्वित प्रयास का आह्वान

सोरेन ने कहा कि ग्रामीण परिवारों को स्थायी आजीविका देने के लिए सरकार, स्वयंसेवी संस्थाओं (NGOs) और निजी क्षेत्र को एक साथ आना होगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि यदि इस सहकारी मॉडल को राज्य में सही तरीके से लागू किया जाए, तो यह झारखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकता है।

क्यों अहम है यह पहल?

झारखं विधानसभा की महिला एवं बाल विकास समिति की सभापति के रूप में  कल्पना सोरेन की यह सक्रियता राज्य की संसदीय समितियों की कार्यक्षमता को भी दर्शाती है। उनके इस सुझाव को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए अब सरकारी नीतियों में बदलाव की संभावनाएं देखी जा रही हैं।

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