RIMS' 'Letter Bomb'

रिम्स का ‘लेटर बम’: पूर्व निदेशक के 22 गंभीर आरोपों से स्वास्थ्य विभाग में मची खलबली, वायरल पत्र में उजागर हुआ गहरा विवाद

 

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RIMS' 'Letter Bomb'

नवींन कुमार

रांची: झारखंड के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान, राजेन्द्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स), एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। रिम्स के पूर्व निदेशक डॉ. राजकुमार द्वारा स्वास्थ्य मंत्री को लिखे गए एक ‘गोपनीय पत्र’ के सार्वजनिक होने से राज्य के स्वास्थ्य महकमे में भूचाल आ गया है। इस पत्र में पूर्व निदेशक ने रिम्स के प्रशासनिक कामकाज, शासन व्यवस्था और स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

क्या है पूरा मामला?

डॉ. राजकुमार ने अपना इस्तीफा सौंपने से पहले स्वास्थ्य मंत्री को एक पत्र भेजा था, जिसमें उन्होंने 22 बिंदुओं के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश की है कि कैसे एक साल से उन्हें संस्थान के विकास कार्यों के बजाय ‘विभागीय उत्पीड़न’ और ‘प्रशासनिक दबाव’ का सामना करना पड़ा।

पत्र के प्रमुख 22 बिंदुओं का विस्तृत विश्लेषण

डॉ. राजकुमार के पत्र में उठाए गए आरोपों को मुख्य रूप से चार बड़े क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है:

1. सुनियोजित प्रशासनिक दबाव और उत्पीड़न

पूर्व निदेशक का मुख्य आरोप है कि पिछले एक वर्ष से स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव (ACS) द्वारा उन्हें उनके पद से हटाने के लिए सुनियोजित षड्यंत्र रचा जा रहा था। उन्होंने दावा किया कि शासी परिषद (Governing Body) की बैठकों को नियम विरुद्ध तरीके से संचालित किया गया और उन पर बार-बार अकारण दबाव बनाया गया।

2. कानूनी लड़ाई और न्यायालय की अवमानना

पत्र में उल्लेख है कि अप्रैल 2025 में उन्हें पद से हटाने का जो आदेश दिया गया था, उसे बाद में उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। न्यायालय ने न केवल उस आदेश पर रोक लगाई, बल्कि विभाग को अपना निर्णय वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बावजूद, निदेशक का आरोप है कि विभाग ने लगातार उन पर शो-कॉज (Show Cause) नोटिस जारी किए, जो पूरी तरह से बेबुनियाद थे।

3. पारिवारिक मामलों का राजनीतिकरण

डॉ. राजकुमार ने सबसे तीखा प्रहार अपने बेटे की नियुक्ति और नामांकन के मामले पर किया है। उन्होंने पत्र में लिखा है कि उनके पुत्र के ‘मास्टर इन हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन’ में नामांकन और सीनियर रेजिडेंट के रूप में चयन को विभाग ने व्यक्तिगत प्रतिशोध का हथियार बना लिया। उन्होंने दावा किया कि उच्च न्यायालय ने उनके पुत्र के मामले में स्पष्ट निर्देश दिया था कि विभाग को ऐसी कार्यवाही का कोई अधिकार नहीं है, बावजूद इसके जाँच जारी रखना न्यायालय के आदेश की अवमानना है।

4. शासी परिषद की बैठकों का दुरूपयोग

पत्र के अनुसार, रिम्स की शासी परिषद की बैठकों में निदेशक को बार-बार ‘टारगेट’ किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि बैठक के ड्राफ्ट को बाद में बदला गया और ऐसे निर्णय थोपे गए जो कभी हुए ही नहीं थे। उन्होंने यह भी कहा कि बैठकों की आधिकारिक कार्यवाही (Minutes) उन्हें उपलब्ध नहीं कराई जाती थी, जो कि रिम्स की नियमावली का सीधा उल्लंघन है।

संस्थान की छवि पर क्या असर?

इस पत्र के वायरल होने से रिम्स की आंतरिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लग गए हैं:

प्रशासनिक अस्थिरता: रिम्स जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में निदेशक और विभाग के बीच लंबे समय से चल रहा यह टकराव सीधे तौर पर मरीजों की सुविधाओं और संस्थान के विकास कार्यों को प्रभावित कर रहा है।

मीडिया और साख: पूर्व निदेशक ने स्पष्ट आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ विभाग द्वारा मीडिया में प्लांटेड खबरें चलवाई गईं ताकि उनकी व्यक्तिगत छवि को धूमिल किया जा सके।

फिलहाल, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पत्र में जिस प्रकार से कोर्ट केस नंबर और तारीखों का हवाला दिया गया है, उससे मामला अत्यंत गंभीर प्रतीत होता है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
यह पत्र न केवल डॉ. राजकुमार के इस्तीफे के कारणों पर प्रकाश डालता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि रिम्स की स्वायत्तता और स्वास्थ्य विभाग के नियंत्रण के बीच का यह संघर्ष राज्य के स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक बड़ा संकट बन चुका है। अब राज्य की जनता और स्वास्थ्य जगत की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार इन 22 बिंदुओं की उच्च-स्तरीय जांच कराएगी या यह मामला फाइलों में ही दबा दिया जाएगा।

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