Another family devastated at Jharkhand Ispat.

रामगढ़: झारखंड इस्पात में फिर उजड़ा एक परिवार, प्रबंधन पर लगा मजदूर की जिंदगी की कीमत ’80 हजार’ लगाने का आरोप

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Another family devastated at Jharkhand Ispat.

गुड्डू पांडेय / रामगढ़ 

रामगढ़: झारखंड के रामगढ़ स्थित हेसला औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत ‘झारखंड इस्पात संयंत्र’ एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। महज तीन महीने के भीतर हुई  छठे मजदूर की मौत ने फैक्ट्री प्रबंधन की कार्यशैली और सुरक्षा दावों की पोल खोल दी है। इस बार गोपी करमाली नामक दलित मजदूर की मौत ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या एक गरीब मजदूर की 25 साल की मेहनत और उसकी जिंदगी की कीमत प्रबंधन की नजर में मात्र 80 हजार रुपये है?

क्या है पूरा मामला?

मृतक गोपी करमाली के परिजनों के अनुसार, वे पिछले 25 वर्षों से संयंत्र में सेवा दे रहे थे। 29 जून की सुबह जब वे ड्यूटी पर थे, तो अचानक उनके पेट में तेज दर्द उठा। परिजनों का आरोप है कि प्रबंधन की ओर से न तो एम्बुलेंस उपलब्ध कराई गई और न ही प्राथमिक उपचार की कोई व्यवस्था की गई। अंततः उन्हें परिजनों द्वारा बाइक पर घर ले जाया गया, जहाँ से रामगढ़ और बाद में रांची के रिम्स में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

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प्रबंधन पर लगे गंभीर आरोप

परिजनों ने प्रबंधन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं:

संवेदनहीनता: मौत के बाद कई दिनों तक प्रबंधन का कोई भी अधिकारी परिवार का हाल जानने तक नहीं पहुंचा।

मुआवजे के नाम पर अपमान: परिजनों का आरोप है कि कुछ जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में प्रबंधन ने सिर्फ 80 हजार रुपये देकर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया, जो एक मजदूर के जीवन का सीधा अपमान है।

श्रम कानूनों की अनदेखी: 25 साल काम करने के बावजूद गोपी करमाली न तो स्थायी थे और न ही उन्हें पीएफ (PF) जैसी वैधानिक सुविधाओं का लाभ मिल रहा था।

तीन महीने में 6 मौत, प्रशासन मौन

झारखंड इस्पात संयंत्र में हादसों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसी साल अप्रैल महीने में हुए भीषण हादसे में पांच मजदूरों ने अपनी जान गंवा दी थी। उस बड़ी घटना के जख्म अभी भरे भी नहीं थे कि 29 जून को हुई गोपी करमाली की मौत ने पूरे क्षेत्र में आक्रोश फैला दिया है। लगातार हो रही इन मौतों के बाद भी जिला प्रशासन की चुप्पी स्थानीय लोगों और श्रमिक संगठनों के लिए एक बड़ा रहस्य बनी हुई है।

इलाज के लिए भी लेना पड़ा कर्ज

मृतक के परिजनों का कहना है कि जिस वक्त गोपी का इलाज चल रहा था, उस समय परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। प्रबंधन की ओर से कोई सहायता न मिलने के कारण उन्हें इलाज के लिए भारी कर्ज लेना पड़ा। अब परिवार के सामने भरण-पोषण का संकट खड़ा हो गया है।

न्याय की मांग उठी

इस घटना के बाद श्रमिक संगठनों ने कड़ा रुख अपना लिया है। संगठनों ने मांग की है कि:

पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषी प्रबंधन पर कड़ी कार्रवाई हो।

मृतक के आश्रित को उचित मुआवजा और फैक्ट्री में स्थायी नौकरी दी जाए।

संयंत्र में श्रम कानूनों और सुरक्षा मानकों की अनिवार्य जांच हो ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को यह दिन न देखना पड़े।

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