A businessman was jailed for 57 days after mistaking spices for drugs; the High Court granted him justice after 16 years.

झारखंड हाईकोर्ट ने खारिज की वन भूमि घोटाले की PIL, CBI-ED जांच से किया इनकार

A businessman was jailed for 57 days after mistaking spices for drugs; the High Court granted him justice after 16 years.
A businessman was jailed for 57 days after mistaking spices for drugs; the High Court granted him justice after 16 years.

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में कथित वन भूमि घोटाले और वरिष्ठ वन अधिकारियों की मिलीभगत के आरोपों से जुड़ी जनहित याचिका (PIL) का निस्तारण करते हुए CBI और प्रवर्तन निदेशालय (ED) से जांच कराने की मांग खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर ऐसी कोई परिस्थिति नहीं बनती, जिससे CBI या ED जांच का आदेश दिया जाए।

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याचिका में आरोप लगाया गया था कि झारखंड के विभिन्न जिलों, विशेषकर हजारीबाग और बोकारो में बड़ी मात्रा में वन भूमि की अवैध बिक्री की गई है तथा इसमें वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत है। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि करीब 450 एकड़ वन भूमि का अवैध हस्तांतरण हुआ है और इसकी जांच केंद्रीय एजेंसियों से कराई जानी चाहिए।

हालांकि, कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा दाखिल हलफनामों, जांच रिपोर्टों और रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पाया कि याचिका में लगाए गए अधिकांश आरोपों का समर्थन करने वाला कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। अदालत ने कहा कि वन विभाग द्वारा किसी भी बिक्री विलेख के लिए ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC)’ जारी किए जाने का आरोप भी रिकॉर्ड से प्रमाणित नहीं होता।

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सरकार पहले से कर रही थी कार्रवाई

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि वन विभाग और संबंधित सरकारी एजेंसियां याचिका दायर होने से पहले ही कथित अतिक्रमण और वन भूमि के मामलों की जांच कर रही थीं। जहां भी अतिक्रमण या अनियमितता प्रथम दृष्टया पाई गई, वहां वन अपराध दर्ज किए गए, बेदखली की कार्रवाई शुरू की गई और कई मामलों में अवैध बिक्री विलेख निरस्त कराने के लिए सिविल मुकदमे भी दायर किए गए।

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इलेक्ट्रोस्टील मामले पर भी टिप्पणी

याचिकाकर्ता ने एम/एस इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स लिमिटेड पर लगभग 174.39 एकड़ वन भूमि पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया था। इस पर कोर्ट ने कहा कि आरोप वर्ष 2009 से संबंधित हैं, जबकि याचिका 2020 में दायर की गई। याचिकाकर्ता ने इस देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया। साथ ही, कंपनी और जिन अधिकारियों पर मिलीभगत का आरोप लगाया गया, उन्हें भी पक्षकार नहीं बनाया गया। अदालत ने पाया कि संबंधित एजेंसियां 2009 से ही इस मामले में कार्रवाई कर रही थीं।

CBI-ED जांच की मांग खारिज

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि CBI जांच का आदेश केवल आरोपों के आधार पर नहीं दिया जा सकता। इसके लिए प्रथम दृष्टया मजबूत साक्ष्य और असाधारण परिस्थितियों का होना आवश्यक है। इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं पाया गया।

याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता पर सवाल

अदालत ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता की ओर से पूर्व में दायर कई जनहित याचिकाओं पर भी सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट प्रतिकूल टिप्पणी कर चुके हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता और मंशा पर गंभीर प्रश्न उठते हैं तथा इस मामले में भी कई आरोप बिना पर्याप्त साक्ष्य के लगाए गए।

क्लीन चिट नहीं

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस फैसले को किसी भी व्यक्ति या संस्था को क्लीन चिट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जिन मामलों में पहले से जांच, मुकदमे या अन्य कानूनी कार्रवाई लंबित हैं, वे सभी कानून के अनुसार अपने गुण-दोष के आधार पर आगे बढ़ेंगे और इस फैसले की टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होंगे।

अंत में अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए 450 एकड़ वन भूमि के अवैध हस्तांतरण के आरोप बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए थे। चूंकि संबंधित प्राधिकरण पहले से कार्रवाई कर रहे हैं और आगे किसी अतिरिक्त न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, इसलिए जनहित याचिका का निस्तारण कर दिया गया। इस मामले में अदालत ने याचिकाकर्ता पर कोई अतिरिक्त लागत (कॉस्ट) नहीं लगाई।

 

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