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सड़क नहीं, खटिया बनी एंबुलेंस! गर्भवती महिला को 4 किलोमीटर तक कंधों पर ढोकर ले गए ग्रामीण

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पाकुड़ के मासधारी गांव में स्वास्थ्य व्यवस्था की खुली पोल, प्रसव पीड़ा से कराहती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों ने उठाया जोखिम

लिट्टीपाड़ा (Pakud )। झारखंड के ग्रामीण इलाकों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली किस तरह लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रही है, इसकी एक मार्मिक तस्वीर पाकुड़ जिले के लिट्टीपाड़ा प्रखंड स्थित मासधारी गांव से सामने आई है। यहां सड़क के अभाव में एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा के दौरान खटिया पर लिटाकर ग्रामीणों ने करीब चार किलोमीटर तक कंधों पर ढोया। गांव में आपात स्थिति से निपटने के लिए आज भी एंबुलेंस की जगह खटिया ही एकमात्र सहारा बनी हुई है।

सड़क नहीं, खटिया बनी एंबुलेंस! गर्भवती महिला को 4 किलोमीटर तक कंधों पर ढोकर ले गए ग्रामीण

प्रसव पीड़ा शुरू होते ही बढ़ी परिजनों की चिंता

जानकारी के अनुसार, गुरुवार को मासधारी गांव निवासी पीरका पहाड़िया की 25 वर्षीय पत्नी बागी पहाड़िन को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। महिला की हालत को देखते हुए परिजन उसे जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाना चाहते थे, लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस पहुंचना संभव नहीं था। ऐसे में परिजनों के सामने महिला को अस्पताल पहुंचाने की चुनौती खड़ी हो गई। समय की गंभीरता को देखते हुए ग्रामीणों ने खटिया को ही अस्थायी एंबुलेंस बनाने का फैसला किया।

सड़क नहीं, खटिया बनी एंबुलेंस! गर्भवती महिला को 4 किलोमीटर तक कंधों पर ढोकर ले गए ग्रामीण

चार किलोमीटर तक कंधों पर ढोई गई महिला

ग्रामीणों ने गर्भवती महिला को खटिया पर लिटाया और बारी-बारी से उसे अपने कंधों पर उठाकर पैदल चलना शुरू किया। करीब चार किलोमीटर की कठिन दूरी तय करने के बाद महिला को मुख्य सड़क तक पहुंचाया गया। इसके बाद उसे अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की गई। इस दौरान ग्रामीणों को काफी मशक्कत करनी पड़ी। घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित गांवों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं किस तरह पहुंचेंगी?

सड़क के अभाव में हर आपात स्थिति बन जाती है चुनौती

मासधारी गांव की यह घटना केवल एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी की गंभीर तस्वीर पेश करती है। सड़क नहीं होने के कारण मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में देरी का खतरा बना रहता है। खासकर गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए ऐसी परिस्थितियां बेहद मुश्किल साबित हो सकती हैं। ग्रामीणों की इस मजबूरी ने एक बार फिर सड़क निर्माण और स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग इस गांव की समस्या को गंभीरता से लेते हुए सड़क और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था के लिए क्या कदम उठाते हैं।

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