A unique 'Rakhi' for environmental protection: 'Raksha Sutra' tied to trees; campaign launched to tie Rakhis to three lakh trees.

पर्यावरण रक्षा की अनोखी राखी: पेड़ों पर बांधा रक्षा सूत्र, तीन लाख वृक्षों को राखी बांधने का अभियान शुरू

A unique 'Rakhi' for environmental protection: 'Raksha Sutra' tied to trees; campaign launched to tie Rakhis to three lakh trees.
A unique ‘Rakhi’ for environmental protection: ‘Raksha Sutra’ tied to trees; campaign launched to tie Rakhis to three lakh trees.

निर्मल सिंह

गुमला: देशभर में जहां रक्षाबंधन के मौके पर बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र और सुरक्षा की कामना कर रही हैं, वहीं गुमला जिले में रक्षाबंधन का अनोखा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा रूप देखने को मिला। यहां भाइयों की कलाई के बजाय पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधकर उनकी रक्षा का संकल्प लिया गया।

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गुमला वन प्रमंडल की ओर से सदर प्रखंड के जोराग, आंजन और तर्री गांव में विशेष रक्षा बंधन कार्यक्रम आयोजित किया गया। अभियान की शुरुआत झारखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार ने जोराग गांव में एक पेड़ को राखी बांधकर की। इस दौरान गुमला वन प्रमंडल पदाधिकारी बेलाल अहमद, वन विभाग के कर्मी और वन समितियों से जुड़े सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे। ग्रामीणों ने पेड़ों को राखी बांधकर जंगलों की रक्षा और उन्हें आग से बचाने का संकल्प लिया।

एक महीने में तीन लाख पेड़ों को राखी बांधने का लक्ष्य

प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार ने बताया कि यह पहल ‘पेड़ बचाओ’ अभियान का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन भाई-बहनों के बीच रक्षा के संकल्प का पर्व है। इसी तरह पर्यावरण और पेड़ों की रक्षा करना भी हमारी जिम्मेदारी है, क्योंकि मानव जीवन प्रकृति पर निर्भर है।

उन्होंने बताया कि रक्षाबंधन के दिन राज्य के करीब 700 गांवों में लगभग एक लाख पेड़ों को राखी बांधने का लक्ष्य रखा गया है। यह अभियान एक महीने तक चलेगा। इस दौरान झारखंड के 24 जिलों के चयनित गांवों में कुल तीन लाख पेड़ों पर राखी बांधने का लक्ष्य है। अभियान की शुरुआत गुमला से की गई है।

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पेड़ों से भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाना उद्देश्य

वन विभाग के अनुसार अभियान का उद्देश्य केवल पेड़ों को राखी बांधने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए ग्रामीणों में पेड़ों और जंगलों के प्रति भावनात्मक जुड़ाव पैदा करना है, ताकि वे जंगलों की कटाई और आग से होने वाले नुकसान को रोकने में सक्रिय भूमिका निभाएं। वन विभाग का मानना है कि जब ग्रामीण पेड़ों को परिवार के सदस्य की तरह मानेंगे, तो उनके संरक्षण की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी।

2004 में धनबाद से हुई थी पहल की शुरुआत

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस पहल की शुरुआत वर्ष 2004 में धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड के लुकाइया गांव से हुई थी। उस समय यह इलाका माओवादी गतिविधियों से प्रभावित था। प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार की सोच से शुरू हुई इस पहल से अब तक राज्य के 12 हजार से अधिक गांव जुड़ चुके हैं।

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लुकाइया गांव में इस अभियान का सकारात्मक असर भी देखने को मिला। वहां ग्रामीणों ने 20 हजार से अधिक महुआ के पेड़ों को कटने से बचाया। आज यही पेड़ ग्रामीणों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार बने हुए हैं। कई अन्य गांवों में भी लघु वन उत्पादों को बढ़ावा मिला है।

दो दशक में बढ़ा झारखंड का वन क्षेत्र

वन संरक्षण के इन प्रयासों का असर झारखंड के वन क्षेत्र में भी देखने को मिला है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2001 में झारखंड का वन क्षेत्र 22,637 वर्ग किलोमीटर था, जो वर्ष 2023 में बढ़कर 23,765.78 वर्ग किलोमीटर हो गया। इस तरह करीब दो दशकों में राज्य के वन क्षेत्र में 1,128 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई है। यह राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का करीब 29.76 प्रतिशत है।

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Drishti Now

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वरिष्ठ संवाददाता

झारखंड की राजनीति, प्रशासन और स्थानीय खबरों पर लंबे समय से रिपोर्टिंग कर रहे हैं।