अर्जुन मुंडा ने झारखंड सरकार की पेसा नियमावली को बताया आदिवासी स्वशासन के खिलाफ
अर्जुन मुंडा ने झारखंड सरकार की पेसा नियमावली को बताया आदिवासी स्वशासन के खिलाफ
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रांची, 04 जनवरी : भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने रांची स्थित पार्टी के प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में झारखंड सरकार पर तीव्र प्रहार किया। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा हाल ही में अधिसूचित पेसा (पंचायती राज विस्तार अनुसूचित क्षेत्रों में) अधिनियम की नियमावली को 1996 के मूल कानून की भावना के पूरी तरह विपरीत बताया।अर्जुन मुंडा ने कहा, “आज मैं एक गंभीर और महत्वपूर्ण विषय पर बात करना चाहता हूं। झारखंड सरकार ने पेसा अधिनियम से जुड़े जो नियम बनाए हैं, वे इस कानून की मूल भावना के खिलाफ हैं।” उन्होंने याद दिलाया कि 2019 में जब वे केंद्र सरकार में जनजातीय मामलों के मंत्री थे, तब संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत पेसा अधिनियम को लागू करने पर व्यापक चर्चा हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा को सशक्त बनाना और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को मजबूत करना था।
पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने झारखंड को कई बार पत्र लिखकर पेसा लागू करने का आग्रह किया, लेकिन राज्य सरकार ने लंबे समय तक टालमटोल की। अब जब नियमावली बनाई गई है, तो इसमें ग्राम सभा के अधिकारों को जानबूझकर कमजोर कर दिया गया है। “राज्य सरकार ने पेसा अधिनियम 1996 की आत्मा को खत्म कर दिया है।
यह नियमावली आदिवासी स्वशासन के बजाय केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है, जो आगे चलकर गंभीर समस्याएं पैदा करेगी,” मुंडा ने कहा।उन्होंने जोर देकर कहा कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में सरकार को अत्यंत संवेदनशील होकर काम करना चाहिए, लेकिन वर्तमान झारखंड सरकार आदिवासियों के हितों की पूरी तरह अनदेखी कर रही है।
मुंडा ने पारंपरिक आदिवासी व्यवस्थाओं जैसे मुंडा-मानकी, मांझी-परगना आदि को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया और चेतावनी दी कि यह नियमावली आदिवासी समाज की अस्मिता को कमजोर करेगी।गौरतलब है कि झारखंड कैबिनेट ने दिसंबर 2025 में पेसा नियमावली को मंजूरी दी थी और जनवरी 2026 में इसकी अधिसूचना जारी की गई। राज्य सरकार इसे आदिवासी सशक्तिकरण का बड़ा कदम बताती है, जिसमें ग्राम सभा को भूमि अधिग्रहण, खनन, वन उत्पाद और विकास योजनाओं पर अधिक अधिकार दिए गए हैं।
हालांकि, भाजपा सहित कई आदिवासी संगठन और नेता इसे अपर्याप्त बताते हुए पारंपरिक व्यवस्थाओं को पूरी तरह मान्यता न देने का आरोप लगा रहे हैं।

















