A businessman was jailed for 57 days after mistaking spices for drugs; the High Court granted him justice after 16 years.

बोकारो स्टील प्लांट भूमि मुआवजा विवाद: झारखंड हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज, पहले सिविल कोर्ट से साबित करें जमीन पर मालिकाना हक

A businessman was jailed for 57 days after mistaking spices for drugs; the High Court granted him justice after 16 years.
 

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने बोकारो स्टील प्लांट (बीएसएल) से जुड़े बहुचर्चित भूमि मुआवजा विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल यह दावा करने से कि जमीन का उपयोग प्लांट द्वारा किया गया है, मुआवजा नहीं मिल सकता। यदि जमीन पर मालिकाना हक (टाइटल) विवादित है तो पहले संबंधित व्यक्ति को सिविल कोर्ट से अपना अधिकार घोषित कराना होगा। इसके बाद ही मुआवजे का दावा किया जा सकता है।

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न्यायमूर्ति आनंद सेन की अदालत ने WP(C) No. 3509 of 2020 में 14 जुलाई 2026 को फैसला सुनाते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया।

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क्या था मामला?

बोकारो जिले के चार ग्रामीणों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि मौजा कनारी की लगभग 78.86 एकड़ भूमि पर बोकारो स्टील प्लांट ने बिना वैधानिक अधिग्रहण के बाउंड्री वॉल बनाकर कब्जा कर लिया और वर्षों से उसका उपयोग कर रहा है।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि राज्य सरकार की जांच समिति ने उन्हें वास्तविक भूमि विस्थापित (Land Losers) माना था और मुआवजा देने की अनुशंसा भी की थी। इसके बावजूद आज तक उन्हें न तो मुआवजा मिला और न ही वैधानिक ब्याज।

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राज्य सरकार ने क्या कहा?

राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि जिस जमीन पर याचिकाकर्ता दावा कर रहे हैं, वह गैरमजरुआ खास (सरकारी भूमि) है।

सरकार के अनुसार—

यह जमीन कैडस्ट्रल सर्वे में सरकारी भूमि दर्ज है।
वर्ष 1968 में इसे बिना किसी मुआवजे के बोकारो स्टील प्लांट को हस्तांतरित किया गया था।
याचिकाकर्ताओं या उनके पूर्वजों के नाम किसी वैध सरकारी रिकॉर्ड में रैयत के रूप में दर्ज नहीं हैं।
केवल किराया रसीद (Rent Receipt) या “बुझारत पंजी” में नाम होना स्वामित्व का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

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SAIL ने भी किया दावा खारिज

स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) ने अदालत में कहा कि—

बोकारो स्टील प्लांट के लिए 49 गांवों की करीब 31,287 एकड़ भूमि अधिग्रहित की गई थी।
कनारी गांव की अधिकांश भूमि राज्य सरकार ने अधिग्रहित कर प्लांट को सौंपी थी।
सरकारी भूमि अलग से निशुल्क हस्तांतरित हुई थी।
मुआवजा देना राज्य सरकार का दायित्व था, SAIL का नहीं।
याचिकाकर्ताओं ने करीब पांच दशक बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया है।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि—

किराया रसीद (Rent Receipt) स्वामित्व का प्रमाण नहीं होती।
यदि सरकारी रिकॉर्ड में भूमि गैरमजरुआ खास दर्ज है और याचिकाकर्ता के नाम रैयती अधिकार दर्ज नहीं हैं, तो केवल दावे के आधार पर मुआवजा नहीं दिया जा सकता।
संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट जटिल भूमि स्वामित्व विवादों का फैसला नहीं कर सकता क्योंकि इसमें मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों की विस्तृत जांच आवश्यक होती है।
याचिकाकर्ताओं को क्या करना होगा?

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता स्वयं को वास्तविक भू-स्वामी मानते हैं तो उन्हें पहले सक्षम सिविल कोर्ट में जाकर अपने अधिकार, स्वामित्व और हित (Right, Title and Interest) की घोषणा करानी होगी।

यदि सिविल कोर्ट उनके पक्ष में फैसला देता है और यह साबित हो जाता है कि संबंधित भूमि का अधिग्रहण हुआ था, तभी उन्हें मुआवजा मिलने का प्रश्न उठेगा।

 

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