हजारीबाग की 24.79 एकड़ जमीन विवाद पर झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 60 साल पुरानी जमाबंदी नहीं होगी रद्द, सिविल कोर्ट ही तय करेगा मालिकाना हक
झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग की 24.79 एकड़ जमीन विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि वर्षों पुरानी जमाबंदी राजस्व अधिकारी रद्द नहीं कर सकते। मालिकाना हक का फैसला केवल सिविल कोर्ट करेगा। डिवीजन बेंच ने खारिज की एलपीए, कहा- राजस्व अधिकारियों के पास नहीं है वर्षों पुरानी जमाबंदी रद्द करने का अधिकार

रांची झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने हजारीबाग जिले के दरू अंचल स्थित काबिलासी गांव की 24.79 एकड़ भूमि को लेकर वर्षों से चल रहे विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि **एक बार किसी व्यक्ति के नाम पर जमाबंदी दर्ज हो जाने के बाद उसे राजस्व विभाग या अन्य प्रशासनिक अधिकारी रद्द नहीं कर सकते।यदि किसी को उस जमाबंदी पर आपत्ति है तो उसका समाधान केवल सक्षम सिविल न्यायालय में वाद दायर कर ही किया जा सकता है।

मुख्य न्यायाधीश की डिवीजन बेंच ने डब्ल्यूपी (सी) संख्या 1615/2017में एकल पीठ द्वारा 22 दिसंबर 2025 को पारित आदेश को सही ठहराते हुए लेटर्स पेटेंट अपील (एलपीए) को खारिज कर दिया। हालांकि अदालत ने अपीलकर्ताओं को यह स्वतंत्रता दी कि वे यदि चाहें तो कानून के तहत उपलब्ध अन्य वैधानिक उपाय अपना सकते हैं।
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क्या है पूरा मामला?
विवाद हजारीबाग के दारू अंचल अंतर्गत मौजा काबिलासी की खाता संख्या-36 के प्लॉट संख्या 1355, 839 एवं 842 से जुड़ा है, जिसकी कुल रकबा 24.79 एकड़ है।
अपीलकर्ताओं का दावा था कि यह भूमि लगभग 90 वर्ष पहले उनके पूर्वजों के नाम बंदोबस्त की गई थी। उनके अनुसार उनके पूर्वजों के नाम म्यूटेशन हुआ था और वर्षों तक लगान रसीदें भी जारी होती रहीं। परिवार आज भी उसी भूमि पर मकान बनाकर रह रहा है तथा खेती कर अपनी आजीविका चला रहा है।
उनका आरोप था कि वर्ष 2015 में दिवंगत विश्वनाथ बैद्य ने स्वयं को जमीन का मालिक बताते हुए बोर्ड ऑफ रेवेन्यू में आवेदन दिया, जिसके बाद अधिकारियों ने बिना नोटिस दिए उनके पक्ष में लगान रसीद जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। अपीलकर्ताओं ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया।
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2015 में क्या हुई थी कार्रवाई?
रिकॉर्ड के अनुसार विश्वनाथ बैद्य ने अगस्त 2015 में दरू अंचल कार्यालय और उपायुक्त कार्यालय में आवेदन देकर अपने नाम पर लंबित लगान स्वीकार करने और रसीद जारी करने की मांग की थी।
जब स्थानीय स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने 2 अक्टूबर 2015 को झारखंड बोर्ड ऑफ रेवेन्यू से हस्तक्षेप की मांग की। इसके बाद बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने 9 अक्टूबर 2015 को उपायुक्त को पत्र भेजकर आवश्यक कार्रवाई करने को कहा।
उपायुक्त ने 6 अक्टूबर 2015 को अंचल अधिकारी को निर्देश दिया, जिसके बाद मिसलेनियस केस संख्या-02/2015-16 दर्ज कर हल्का कर्मचारी को विश्वनाथ बैद्य के नाम लगान रसीद जारी करने का निर्देश दिया गया।
अपीलकर्ताओं ने क्या-क्या आरोप लगाए?
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में कहा कि—
उन्हें कोई नोटिस या सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया।
बोर्ड ऑफ रेवेन्यू को ऐसा आदेश देने का अधिकार नहीं था।
विश्वनाथ बैद्य ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दावा किया।
पहले से उनके पूर्वजों के नाम राजस्व अभिलेख और रसीदें थीं।
बिना जांच के उनके अधिकारों की अनदेखी कर दी गई।
इन्हीं आधारों पर उन्होंने उपायुक्त, अंचल अधिकारी तथा बोर्ड ऑफ रेवेन्यू की कार्रवाई को रद्द करने की मांग की थी।
दूसरी ओर प्रतिवादियों ने क्या कहा?
विश्वनाथ बैद्य के कानूनी उत्तराधिकारियों ने अदालत को बताया कि—
1964-65 में ही मिसलेनियस केस संख्या 17/64-65 एवं 18/64-65 के तहत उनके नाम जमाबंदी खोली जा चुकी थी।
1964-65 से 1976-77 तक नियमित रूप से लगान रसीदें जारी हुई थीं।
वर्ष 2015 में कोई नई जमाबंदी नहीं खोली गई बल्कि पुरानी जमाबंदी के आधार पर केवल रुकी हुई रसीदें जारी की गईं।
प्रशासनिक जांच में भी उनके कब्जे की पुष्टि हुई थी।
राज्य सरकार ने भी अदालत को बताया कि जांच के दौरान अपीलकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत कई दस्तावेज अधूरे अथवा संदिग्ध पाए गए थे।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर क्या पाया?
डिवीजन बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से बताता है कि—
वर्ष 1965 से विश्वनाथ बैद्य के नाम जमाबंदी चल रही थी।
वर्ष 1964-65 से 1976-77 तक उनके नाम लगान रसीदें भी जारी हुई थीं।
वर्ष 2015 में केवल उसी पुरानी जमाबंदी के आधार पर आगे की लगान रसीदें जारी की गई थीं।
इसलिए यह कहना कि 2015 में पहली बार उनके नाम जमाबंदी खोली गई, तथ्यात्मक रूप से गलत है।
-तीसरे पक्ष को सुनवाई देना जरूरी नहीं”
हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं की उस दलील को भी खारिज कर दिया कि उन्हें सुनवाई का अवसर नहीं मिला।
अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के नाम पहले से जमाबंदी दर्ज है तो उसके नाम पर लगान रसीद जारी करने से पहले किसी तीसरे पक्ष को नोटिस देना कानूनन आवश्यक नहीं है। क्योंकि यह केवल राजस्व रसीद जारी करने की प्रक्रिया है, न कि स्वामित्व तय करने की कार्यवाही।
जांच में क्या सामने आया?
अदालत ने बताया कि शिकायत मिलने के बाद प्रशासन ने अतिरिक्त समाहर्ता, बीडीओ-सह-अंचलाधिकारी, अंचल निरीक्षक, हल्का कर्मचारी, अमीन तथा पुलिस बल की मौजूदगी में स्थल निरीक्षण कराया था।
जांच में पाया गया कि—
विश्वनाथ बैद्य के नाम पुरानी जमाबंदी पहले से मौजूद थी।
वे जमीन पर कब्जे में पाए गए।
शिकायतकर्ताओं के कई दस्तावेज अधूरे या फर्जी प्रतीत हुए।
कब्रिस्तान, छठ घाट, आहर आदि होने के दावे भी सही नहीं पाए गए।
इसके बाद ही आगे की लगान रसीदें जारी की गई थीं।
हाईकोर्ट ने पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में State of Jharkhand vs Izhar Hussain (2020 SCC OnLine Jhar 1978) का उल्लेख करते हुए दोहराया कि **बिहार टेनेंट्स होल्डिंग्स (मेंटेनेंस ऑफ रिकॉर्ड्स) अधिनियम, 1973** में किसी भी राजस्व अधिकारी को जमाबंदी रद्द करने का अधिकार नहीं दिया गया है।
अदालत ने यह भी कहा कि लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को समाप्त करने का एकमात्र रास्ता सक्षम सिविल न्यायालय में मुकदमा दायर करना है।
इसके अलावा अदालत ने महाबीर महतो बनाम झारखंड राज्य (2012) के फैसले का भी हवाला देते हुए कहा कि म्यूटेशन की कार्यवाही में न तो किसी के स्वामित्व का फैसला किया जा सकता है और न ही कब्जा दिलाया या छीना जा सकता है। राजस्व अधिकारियों का अधिकार केवल राजस्व रिकॉर्ड के रखरखाव तक सीमित है।
आखिर में क्या फैसला दिया?
सभी तथ्यों और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि—
एकल पीठ के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।
अपील में कोई मेरिट नहीं है।
इसलिए एलपीए खारिज की जाती है।
हालांकि अपीलकर्ताओं को कानून के तहत उपलब्ध अन्य वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता रहेगी।















