धनबाद का चुनावी दंगल:  सियासत, दावेदारी, राजनीति और मेयर  कुर्सी पर दांव!*

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धनबाद का चुनावी दंगल:  सियासत, दावेदारी, राजनीति और मेयर  कुर्सी पर दांव!*

धनबाद का चुनावी दंगल:  सियासत, दावेदारी, राजनीति और मेयर  कुर्सी पर दांव!*

धनबाद में नगर निगम चुनाव का सियासी पारा चरम पर पहुंच गया है।  नामांकन प्रक्रिया पूरी होते ही साफ हो गया कि मेयर की गद्दी के लिए रास्ता कांटों से पट पड़ा है। भाजपा-झामुमो के उलझे समीकरणों के बीच बहुकोणीय मुकाबला दिग्गजों की असली अग्निपरीक्षा बन गया है। 55 वार्डों वाले इस शहर में, जहां शहरी आबादी करीब 12 लाख है, कुल 30 दावेदार मेयर पद के लिए मैदान में है..

दिग्गजों की जोरदार भिड़ंत,

धनबाद की पहली मेयर रहीं इंदु सिंह (रामधीर सिंह की पत्नी, कोयलांचल के दूसरे ‘डॉन’ के नाम से मशहूर) अपनी पूरी ताकत झोंक चुकी हैं। उनके सामने झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह की दावेदारी ने मुकाबले को और कड़ा बना दिया है। भाजपा ने चालाकी से संजीव अग्रवाल को आधिकारिक समर्थन देकर बड़ा दांव खेला है। वहीं, धनबाद के पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल—जिन्होंने भाजपा छोड़ झामुमो का दामन थामा—अपने पुराने विकास कारनामों के बूते शानदार वापसी की कोशिश में जुटे हैं।

उनका कार्यकाल कमाल है:

झारखंड का एकमात्र 8-लेन सुपर हाईवे, दो हाई-टेक पार्क, चमचमाती सड़कें-स्ट्रीट लाइट्स, और श्मशान-कब्रिस्तान तक का कायापलट!

नए चेहरे उतरे बदलाव की लहर पर, अल्पसंख्यक वोटों में ध्रुवीकरण*

राजनीतिक घरानों के अलावा शहर के बड़े समाजसेवी और उद्यमी भी रिंग में कूद पड़े हैं। केके कॉलेज चेयरमैन रवि चौधरी, उद्यमी रवि बुंदेला, डॉ. सुशील कुमार, मुकेश पांडेय, शांतनु चंद्रा और प्रकाश महतो—ये सभी विकास के बड़े-बड़े वादों के साथ वोटरों को लुभा रहे हैं। खासकर शमशेर आलम और रुस्तम अंसारी के मैदान में उतरने से अल्पसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण तेज हो गया है।

ये नए चेहरे पुरानी सियासत से तंग जनता को ‘बदलाव’ का नारा दे रहे हैं—बेहतर साफ-सफाई, आधुनिक बाजार, कोयला मजदूरों के लिए रोजगार, और प्रदूषण मुक्ति जैसे मुद्दों पर जोर। कुल 30 दावेदारों में से कौन बचेगा, ये 55 वार्डों की जनता तय करेगी!

कौन होगा नया मेयर ?

यह ‘महादंगल’ धनबाद की राजनीति को हमेशा के लिए बदल सकता है। भूमिगत आग की तरह सुलगते मुद्दे—कोयला मजदूरों की बदहाली, प्रदूषण, बुनियादी सुविधाओं की कमी—पर किसका दांव चलेगा? विकास के पुराने चेहरे (जैसे चंद्रशेखर अग्रवाल) या नए समाजसेवी चेहरे (जैसे संजीव अग्रवाल)? फैसला वोटरों के हाथ में है।

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