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जमशेदपुर बिष्टुपुर पब कांड: पुलिस की मौजूदगी में बेटे पर जानलेवा हमले से पिता का छलका दर्द, भाजपा संगठन की चुप्पी पर उठाए गंभीर सवाल

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जमशेदपुर बिष्टुपुर पब कांड: पुलिस की मौजूदगी में बेटे पर जानलेवा हमले से पिता का छलका दर्द, भाजपा संगठन की चुप्पी पर उठाए गंभीर सवाल

नीरज तिवारी / जमशेदपुर 

​जमशेदपुर: बिष्टुपुर स्थित डीडी पब में हुई हिंसक घटना ने शहर को झकझोर कर रख दिया है। इस घटना में गंभीर रूप से घायल हुए युवक प्रत्यूष आनंद के पिता और एक निष्ठावान भाजपा कार्यकर्ता ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की खामोशी पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने इसे एक पिता के लिए सबसे बड़ी पीड़ा करार दिया है।

​पुलिस की मौजूदगी में हुआ जानलेवा हमला

पीड़ित पिता के अनुसार, घटना के दौरान और उसके बाद, जब उनका बेटा प्रत्यूष बिष्टुपुर इलाके में था, तब पुलिस की मौजूदगी के बावजूद हमलावरों ने उस पर बर्बर हमला किया। इतना ही नहीं, पीसीआर वैन के अंदर और बाहर भी उसे निशाना बनाया गया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। वर्तमान में प्रत्यूष अस्पताल में जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है।

​लेकिन दर्द यहीं से शुरू हुआ एक समर्पित भाजपा कार्यकर्ता के रूप में अपनी पहचान रखने वाले पिता ने भावुक होकर कहा, “मैंने जिस संगठन को अपना परिवार माना, आज उसी परिवार के वरिष्ठ नेताओं और पदाधिकारियों की चुप्पी मुझे सबसे ज्यादा चुभ रही है।”

​उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी के लिए चुनाव, जनहित के कार्यक्रम और हर जिम्मेदारी को अपना कर्तव्य समझकर निभाने वाले कार्यकर्ता के लिए इस कठिन परिस्थिति में पार्टी का एक सांत्वना भरा फोन या संदेश तक न आना अत्यंत निराशाजनक है। उन्होंने पूछा, “क्या एक कार्यकर्ता की निष्ठा और संघर्ष की यही कीमत होती है कि संकट की घड़ी में उसका संगठन ही उससे दूर हो जाए?”

उन्होंने BJP के लिए लिखा जिस पार्टी को परिवार समझा, आज उसी परिवार की खामोशी सबसे ज्यादा चुभ रही है…

जब से BJP Jharkhand की सदस्यता ग्रहण की, तभी से इस संगठन को अपना परिवार माना। तन, मन और धन से पूरी निष्ठा के साथ पार्टी की सेवा की। चुनाव हो, संगठनात्मक कार्यक्रम हो या जनहित का कोई अभियान—हर जिम्मेदारी को अपना कर्तव्य समझकर निभाया। कार्यकर्ताओं और नेताओं के सुख-दुख में हमेशा सबसे आगे खड़ा रहा।

लेकिन आज, जब मेरा अपना परिवार जीवन के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है, तब मैं खुद को बेहद अकेला और भीतर से टूटा हुआ महसूस कर रहा हूं।

ऐसी विकट परिस्थिति में मुझे उम्मीद थी कि जिस राजनीतिक परिवार के लिए मैंने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया, उसके वरिष्ठ नेता और पदाधिकारी कम-से-कम एक बार हमारे परिवार का हाल-चाल पूछेंगे। एक फोन कॉल, एक संदेश या सांत्वना के दो शब्द भी इस कठिन समय में बहुत बड़ा संबल बन सकते थे।

लेकिन अत्यंत पीड़ा के साथ कहना पड़ रहा है कि भाजपा के किसी भी बड़े नेता या पदाधिकारी ने हमारे परिवार की सुध लेना भी जरूरी नहीं समझा।

आज मन बार-बार एक ही सवाल पूछ रहा है—

क्या वर्षों की निष्ठा, समर्पण और संघर्ष की यही कीमत होती है?
क्या कार्यकर्ता सिर्फ तब तक अपना होता है, जब तक वह पार्टी के लिए काम करता रहे?
क्या उसके जीवन के सबसे कठिन समय में उसका अपना संगठन भी उसके साथ खड़ा नहीं होता?

उन्होंने अंत में लिखा यह पोस्ट किसी राजनीतिक लाभ, सहानुभूति या विवाद के लिए नहीं है। यह एक टूटे हुए बड़े पिता के दिल की आवाज है, जो अपने बेटे को जिंदगी के लिए लड़ते हुए देख रहा है और साथ ही अपने ही माने जाने वाले राजनीतिक परिवार की खामोशी से भीतर तक आहत है।

मेरी पहली और आखिरी प्राथमिकता सिर्फ प्रत्यूष आनंद का जीवन बचाना है। हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि उसे जल्द स्वस्थ करें और हमारे परिवार को इस कठिन परीक्षा से लड़ने की शक्ति दें।

संकट की घड़ी में ही अपनों की असली पहचान होती है। आज यह सच मैंने बहुत करीब से महसूस किया है।

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