परिसीमन पर हेमंत का साउथ के राज्यो को समर्थन , परिसीमन की बैठक को BJP ने कहा नाटक
परिसीमन को लेकर तमिलनाडु में हुई बैठक को झारखंड के मुख्यमंत्री का सपोर्ट मिलने के बैठक की महत्ता और बढ़ गयी । 22 मार्च को चेन्नई में हुई इस बैठक की अध्यक्षता तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने की थी, और इसका मुख्य उद्देश्य प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया के प्रभावों पर चर्चा करना था, जो 2026 के बाद होने वाली जनगणना के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करेगी। यह बैठक संयुक्त कार्रवाई समिति (Joint Action Committee – JAC) की पहली बैठक थी, जिसमें कई राज्यों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और राजनीतिक नेताओं ने हिस्सा लिया। इस आयोजन को स्टालिन ने “निष्पक्ष परिसीमन (#FairDelimitation) के लिए एक आंदोलन की शुरुआत करार दिया।
बैठक का पृष्ठभूमि और उद्देश्य
परिसीमन भारत में संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को जनसंख्या के आधार पर पुनर्निर्धारित करने की प्रक्रिया है, जो संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत होती है। यह प्रक्रिया हर जनगणना के बाद लागू की जाती है। लेकिन 1976 में 42वें संशोधन के जरिए इसे 2001 तक स्थगित कर दिया गया था, ताकि जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने वाले राज्यों को नुकसान न हो। बाद में इसे 2026 तक बढ़ा दिया गया। अब, 2026 के बाद होने वाली जनगणना के आधार पर परिसीमन की तैयारी चल रही है, जिससे दक्षिणी राज्यों, विशेष रूप से तमिलनाडु, में चिंता बढ़ गई है।
तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों का मानना है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से उनकी संसदीय सीटें कम हो सकती हैं, क्योंकि इन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। दूसरी ओर, उत्तर भारत के राज्य जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार, जहां जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है, को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। इससे दक्षिणी राज्यों का राजनीतिक प्रभाव कम होने का डर है। स्टालिन ने इसे “दक्षिण भारत पर लटकती तलवार” करार दिया और कहा कि यह संघीय ढांचे और लोकतंत्र के लिए खतरा है।
बैठक में शामिल प्रतिनिधि
इस बैठक में कई राज्यों के प्रमुख नेताओं ने हिस्सा लिया, जो इस मुद्दे पर एकजुटता दिखाने के लिए एक मंच पर आए। इसमें शामिल प्रमुख नाम
केरल: मुख्यमंत्री पिनराई विजयन
तेलंगाना: मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी
पंजाब: मुख्यमंत्री भगवंत मान
कर्नाटक: उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार
ओडिशा: बीजू जनता दल (बीजेडी) के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक (वर्चुअल रूप से)
तेलंगाना: भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के वरिष्ठ नेता के.टी. रामा राव
पश्चिम बंगाल: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और अन्य दलों के प्रतिनिधि
पंजाब: शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के प्रतिनिधि
इस बैठक को झारखंड के CM हेमंत सोरेन का भी समर्थन प्राप्त था ।
बैठक के प्रमुख बिंदु और प्रस्ताव
बैठक में एक सात सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे डीएमके सांसद कनिमोझी ने पढ़ा। इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:
परिसीमन को 25 साल तक स्थगित करना: समिति ने मांग की कि 1971 की जनगणना के आधार पर मौजूदा सीटों की संख्या को 2051 तक बनाए रखा जाए। उनका तर्क था कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को दंडित नहीं करना चाहिए।
निष्पक्ष परिसीमन की मांग: स्टालिन ने कहा कि वे परिसीमन के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन यह प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए, जिससे किसी राज्य का प्रतिनिधित्व कम न हो।
संघीय ढांचे की रक्षा: प्रस्ताव में कहा गया कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से दक्षिणी और पूर्वी राज्यों का प्रभाव कम होगा, जिससे संसद में उनकी आवाज दब जाएगी और संघीय ढांचा कमजोर होगा।
कानूनी और राजनीतिक रणनीति: एक विशेषज्ञ पैनल बनाने का प्रस्ताव रखा गया, जो इस मुद्दे पर कानूनी और राजनीतिक रास्ते तलाशेगा।
जागरूकता अभियान: संयुक्त कार्रवाई समिति लोगों में इस मुद्दे के प्रति जागरूकता फैलाएगी और अन्य राज्यों को साथ जोड़ेगी।
संवैधानिक संशोधन की मांग: यह सुनिश्चित करने के लिए कि दक्षिणी राज्यों को नुकसान न हो, संविधान में संशोधन की जरूरत पर जोर दिया गया।
अगली बैठक की घोषणा: अगली बैठक हैदराबाद में अगले महीने आयोजित करने का फैसला लिया गया।
केंद्र सरकार और बीजेपी का रुख
केंद्र सरकार और बीजेपी ने इस बैठक की आलोचना की। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पहले आश्वासन दिया था कि दक्षिणी राज्यों की एक भी सीट कम नहीं होगी और परिसीमन “प्रो-राटा” (आनुपातिक) आधार पर होगा। हालांकि, स्टालिन और अन्य नेताओं ने इस आश्वासन पर भरोसा न करने की बात कही, क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि उत्तरी राज्यों की सीटें नहीं बढ़ेंगी, जिससे दक्षिण का सापेक्षिक प्रभाव कम हो सकता है।
तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने इस बैठक को “राजनीतिक नाटक” करार दिया और कहा कि यह डीएमके की नाकामियों से ध्यान हटाने की कोशिश है। बीजेपी नेताओं ने चेन्नई में काले झंडे के साथ विरोध प्रदर्शन भी किया। पूर्व तेलंगाना राज्यपाल और बीजेपी नेता तमिलिसाई सौंदरराजन ने इसे “भ्रष्टाचार छिपाने की बैठक” कहा।
तमिलनाडु की चिंता
तमिलनाडु के पास वर्तमान में लोकसभा की 39 सीटें हैं, जो कुल 543 का 7.18% है। अगर परिसीमन मौजूदा जनसंख्या (लगभग 7.73 करोड़, 2025 अनुमान) के आधार पर हुआ और लोकसभा की सीटें 848 तक बढ़ीं, तो तमिलनाडु को 45 सीटें मिल सकती हैं, लेकिन उसका हिस्सा 5% तक कम हो जाएगा। वहीं, अगर सीटें 543 पर स्थिर रहीं, तो यह 30 तक गिर सकती हैं। स्टालिन का तर्क है कि 1971 के अनुपात के आधार पर तमिलनाडु को 59 सीटें मिलनी चाहिए, ताकि उसका 7% हिस्सा बरकरार रहे।
राजनीतिक महत्व
यह बैठक न केवल परिसीमन पर चर्चा के लिए थी, बल्कि केंद्र सरकार की बढ़ती केंद्रीकरण की नीतियों के खिलाफ एकजुटता का संदेश भी थी। दक्षिणी राज्य लंबे समय से शिकायत करते रहे हैं कि वे टैक्स में ज्यादा योगदान देते हैं, लेकिन बदले में कम फंड मिलता है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु का केंद्रीय करों और अनुदानों से राजस्व सिर्फ 24% है, जबकि बिहार का 72% और उत्तर प्रदेश का 54% है।
तमिलनाडु में हुई यह बैठक एक क्षेत्रीय मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की कोशिश थी। स्टालिन ने इसे “इतिहास में दर्ज होने वाला दिन” कहा, जब विकास में योगदान देने वाले राज्य अपने अधिकारों के लिए एकजुट हुए। यह आंदोलन आगे कानूनी लड़ाई, संसदीय चर्चा और जन जागरूकता की ओर बढ़ सकता है। हालांकि, बीजेपी और केंद्र सरकार इसे खारिज कर रहे हैं,