श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक की तैयारी की शुरू; क्या सिख, बौद्ध और जैन को भी नहीं मिलेगी एंट्री!

श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक की तैयारी की शुरू; क्या सिख, बौद्ध और जैन को भी नहीं मिलेगी एंट्री!

उत्तराखंड के प्रसिद्ध बदरीनाथ और केदारनाथ धामों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने की तैयारी तेज हो गई है। श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि आगामी बोर्ड बैठक में इस संबंध में प्रस्ताव लाया जाएगा, जिसे पारित कर दिया जाएगा।

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समिति का स्पष्ट कहना है कि बदरीनाथ और केदारनाथ केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं, बल्कि ये वैदिक परंपरा और सनातन धर्म के प्राचीनतम केंद्र हैं। इसलिए इनमें प्रवेश को नागरिक अधिकार की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। इस प्रस्ताव के तहत समिति के अधीन आने वाले बदरीनाथ, केदारनाथ सहित कुल 48 तीर्थ स्थलों में गैर-हिंदुओं की एंट्री पूरी तरह वर्जित हो सकती है।

किन-किन पर लागू होगा प्रतिबंध? मुस्लिम ही नहीं, अन्य गैर-हिंदू भी प्रभावित होंगे?

प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि यह नियम लागू होता है, तो क्या केवल मुस्लिम समुदाय ही इसके दायरे में आएगा, या जैन, बौद्ध, सिख और पारसी जैसे अन्य गैर-हिंदू धर्मों के अनुयायियों पर भी यह लागू होगा? उपलब्ध जानकारी के अनुसार, प्रस्ताव स्पष्ट रूप से “गैर-हिंदुओं” पर केंद्रित है, जिसमें हिंदू धर्म के बाहर के सभी व्यक्ति शामिल हो सकते हैं। हालांकि, कुछ रिपोर्टों में संकेत मिला है कि सिख धर्म के अनुयायियों पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा, क्योंकि सिख धर्म को हिंदू परंपरा से निकट माना जाता है।

यह कदम उत्तराखंड में हाल ही में गंगोत्री धाम में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने के फैसले के बाद आया है, जिससे पूरे देश में बहस छिड़ गई है। समिति इसे धार्मिक पवित्रता, सदियों पुरानी परंपराओं और देवभूमि की सुरक्षा से जोड़ रही है।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं

इस प्रस्ताव पर उत्तराखंड में सियासत भी गरमा गई है। कुछ संगठन और पुजारी इसे स्वागतयोग्य बता रहे हैं, जबकि विपक्षी दल इसे भेदभावपूर्ण करार दे रहे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि धार्मिक स्थलों का प्रबंधन संबंधित समितियां करती हैं, इसलिए उनके फैसले का सम्मान किया जाएगा।

यह मुद्दा अब केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे देश में धार्मिक स्थलों में प्रवेश नियमों, संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वायत्तता पर नई बहस छेड़ रहा है। प्रस्ताव पारित होने के बाद ही इसकी अंतिम रूपरेखा स्पष्ट होगी।

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