डिजिटल क्रांति में खो गई सिमडेगा के मनोरंजन की दुनिया, खंडहर बना राज टॉकीज

सिमडेगा: डिजिटल क्रांति ने मनोरंजन के साधनों को पूरी तरह बदल दिया है। कभी सिमडेगा में छह वीडियो हाउस और एक सिनेमा हॉल लोगों के मनोरंजन के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे। इनसे करीब 50 लोगों को रोजगार भी मिलता था। लेकिन समय के साथ वीडियो हाउस बंद हो गए और जिले का इकलौता सिनेमा हॉल राज टॉकीज भी खंडहर में तब्दील हो गया। अब जिले के सिने प्रेमियों को बड़े पर्दे पर फिल्म देखने के लिए रांची या ओडिशा के राउरकेला जाना पड़ता है।
करीब 25 वर्ष पहले सिमडेगा में नई फिल्में देखने के लिए लोगों में खासा उत्साह रहता था। वीडियो हाउस और राज टॉकीज मनोरंजन के प्रमुख साधन थे। वीडियो हाउस में फिल्में देखने के लिए लोगों की भीड़ जुटती थी। इसके अलावा टीवी, वीसीआर और वीडियो कैसेट किराये पर देने वाली दुकानें भी संचालित होती थीं। हालांकि, टेलीविजन, इंटरनेट, मोबाइल और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते चलन ने धीरे-धीरे मनोरंजन के इन पारंपरिक केंद्रों को अप्रासंगिक बना दिया।
राज टॉकीज सिमडेगा में सिनेमा देखने का प्रमुख केंद्र था। सिनेमा हॉल के प्रबंधन से जुड़े राजेश अग्रवाल के अनुसार, सिमडेगा के जिला बनने से पहले भी यहां सिनेमा हॉल संचालित होते थे और इनके माध्यम से करीब 20 लोगों को रोजगार मिलता था। समय के साथ वीडियो हाउस से मिली प्रतिस्पर्धा, बिजली बिल, टैक्स और संचालन के अन्य खर्चों ने सिनेमा व्यवसाय को प्रभावित किया। बदलती तकनीक के अनुरूप सुविधाओं का विकास नहीं हो पाने के कारण सिनेमा हॉल अपनी पहचान बरकरार नहीं रख सका। आज राज टॉकीज बंद पड़ा है और उसका खंडहर बीते दौर की याद दिलाता है।
एक समय सिमडेगा शहर में छह वीडियो हाउस और दो से अधिक टीवी, वीसीआर व वीडियो कैसेट की दुकानें लोगों के मनोरंजन का लोकप्रिय माध्यम थीं। वीडियो हाउस से पहचान बनाने वाले मिनहाज राजन बताते हैं कि यह कम खर्च में फिल्म देखने का लोकप्रिय साधन था। नई फिल्में रिलीज होने के कुछ समय बाद वीडियो हाउस में उपलब्ध हो जाती थीं, जहां लोग अपनी पसंद की फिल्में देखते थे। शहर के चर्चित केंद्रों में विधायक प्रतिनिधि संतोष कुमार सिंह का नटराज वीडियो हाउस भी शामिल था। लेकिन डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ ये सभी केंद्र धीरे-धीरे बंद हो गए।
आज सिमडेगा में बड़े पर्दे पर फिल्म देखने की सुविधा नहीं होने से युवाओं और सिने प्रेमियों को परेशानी होती है। नई फिल्मों को देखने के लिए उन्हें रांची या राउरकेला जाना पड़ता है। इससे अतिरिक्त समय और पैसे खर्च होते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि जिले में आधुनिक सिनेमा हॉल या मल्टीप्लेक्स खुलने से मनोरंजन की सुविधा मिलने के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
विश्व दृश्य-श्रव्य विरासत दिवस के अवसर पर सिमडेगा के मनोरंजन जगत का यह बदलता स्वरूप स्थानीय इतिहास को सहेजने की जरूरत भी याद दिलाता है। कभी लोगों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाले वीडियो हाउस और राज टॉकीज अब अतीत का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या सिमडेगा में बड़े पर्दे के मनोरंजन की पुरानी पहचान को आधुनिक सुविधाओं के साथ फिर से जीवित किया जा सकेगा?

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