महिला आरक्षण बिल पर बोलीं कल्पना सोरेन- “अधिकार के नाम पर राजनीति और अधूरी तैयारी लोकतंत्र के साथ न्याय नहीं”
महिला आरक्षण बिल पर बोलीं कल्पना सोरेन- “अधिकार के नाम पर राजनीति और अधूरी तैयारी लोकतंत्र के साथ न्याय नहीं”
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रांची : झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की नेता और गांडेय विधायक कल्पना सोरेन ने महिला आरक्षण बिल को लेकर केंद्र सरकार और राजनीतिक विमर्श पर तीखा हमला बोला है। लोकसभा में महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण से जुड़े घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि
महिलाओं को उनका अधिकार मिलना चाहिए, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन इसे राजनीतिक हथियार बनाना गलत है।
अधिकार के नाम पर केवल राजनीति”
कल्पना सोरेन ने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट किया कि महिला सशक्तिकरण एक संवेदनशील मुद्दा है, जिसे चुनावी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा:
> “महिलाओं को अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन अधिकार के नाम पर राजनीति करना और अधूरी तैयारी के साथ मुद्दों को आगे बढ़ाना, देश के लोकतंत्र के साथ न्याय नहीं है। यह समझ से परे है कि जब प्रक्रिया और नियम पहले से तय हैं, तो ऐन चुनाव के वक्त इसे फिर से क्यों उछाला जा रहा है?”
131वें संशोधन और लागू होने की प्रक्रिया पर सवाल
विधायक ने तकनीकी पहलुओं पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि 131वां संविधान संशोधन बिल 2023** में ही पारित हो
चुका है। इस कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि महिला आरक्षण तभी लागू होगा जब:
1. देश में नई जनगणना पूरी हो जाएगी।
2. जनगणना के आंकड़ों के आधार पर सीटों का परिसीमन (Delimitation) होगा।
कल्पना सोरेन ने सवाल उठाया कि जब पक्ष और विपक्ष दोनों जानते हैं कि बिना इन प्रक्रियाओं के आरक्षण लागू नहीं हो सकता, तो राज्यों में विधानसभा चुनाव के समय इसे मुद्दा बनाना केवल एक राजनीतिक रणनीति लगती है।
“ईमानदारी और नीयत की कमी”
सच्चाई को उजागर करते हुए उन्होंने कहा कि बहुमत न मिलने पर मुद्दे को ‘राजनीतिक रंग’ देना पहले से तय पटकथा जैसा लगता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि महिलाओं का हक कोई चुनावी वादा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार प्रक्रिया होनी चाहिए। इसे लागू करने के लिए सरकार के पास:
ठोस डेटा होना चाहिए।
स्पष्ट नीयत होनी चाहिए।
ईमानदारी के साथ प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।
झारखंड की राजनीति में असर
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कल्पना सोरेन का यह बयान झारखंड विधानसभा चुनावों के बीच महिलाओं के बीच पैठ बनाने की कोशिश है। जेएमएम इस मुद्दे के जरिए यह संदेश देना चाहती है कि वह केवल प्रतीकात्मक आरक्षण नहीं, बल्कि ठोस और तुरंत मिलने वाले अधिकारों के पक्ष में है।
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