युगपुरुष ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण: झारखंड के स्वाभिमान और संघर्ष की गौरवगाथा को राष्ट्रीय सम्मान
नवीन कुमार / आकाश सिंह
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!नई दिल्ली/रांची: झारखंड की आत्मा में रचे-बसे और शोषितों की आवाज बनकर आजीवन संघर्ष करने वाले ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन को देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण’ से अलंकृत किया गया है। मंगलवार को संसद भवन में आयोजित एक अत्यंत गरिमामयी और भावुक समारोह में, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान शिबू सोरेन की धर्मपत्नी रूपी सोरेन को प्रदान किया।

यह क्षण केवल एक पुरस्कार ग्रहण करने का नहीं, बल्कि झारखंड के उस लंबे और कठिन जन-आंदोलन को राष्ट्रीय फलक पर मिली सर्वोच्च मान्यता है, जिसने भारत के मानचित्र पर एक अलग राज्य की इबारत लिखी थी। समारोह में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, गांडेय विधायक कल्पना सोरेन, अंजनी सोरेन सहित सोरेन परिवार के अन्य सदस्य उपस्थित थे।
नेमरा के ‘शिवलाल’ से ‘दिशोम गुरु’ तक का सफर
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में एक शिक्षक परिवार में हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन गांधीवादी विचारधारा के थे, जिन्होंने शिक्षा और समाज सुधार की अलख जगाई थी। 27 नवंबर 1957 की वह काली रात, जब महाजनों ने उनके पिता की निर्मम हत्या कर दी, शिबू सोरेन के जीवन का टर्निंग पॉइंट बनी। शोषण के उस भयावह दृश्य ने किशोरावस्था में ही उन्हें अन्याय के खिलाफ खड़ा होने की प्रेरणा दी। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा छोड़ दी और उस रास्ते को चुना, जिसने आगे चलकर लाखों आदिवासियों के जीवन को नई दिशा दी।

आंदोलन की धुरी: झामुमो की स्थापना
शिबू सोरेन ने केवल राजनीति नहीं की, बल्कि उन्होंने समाज को संगठित किया। 1970 के दशक में उन्होंने ‘संताल नवयुवक संघ’ और ‘सोनोत संताल समाज’ का गठन कर आदिवासियों के हक-हुकूक की लड़ाई शुरू की। ‘धनकटनी आंदोलन’ के माध्यम से उन्होंने जमींदारी प्रथा और महाजनी शोषण को कड़ी चुनौती दी।
वर्ष 1973 का वह ऐतिहासिक दिन, जब शिबू सोरेन ने विनोद बिहारी महतो और एके राय के साथ मिलकर ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (झामुमो) की स्थापना की, झारखंड के राजनीतिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। इस त्रिमूर्ति ने अलग राज्य की मांग को मात्र एक नारा नहीं, बल्कि एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप दे दिया। 1975 के आपातकाल के दौरान जेल यात्रा हो या 1987 में निर्मल महतो की शहादत के बाद पार्टी की बागडोर संभालना, शिबू सोरेन हर मोड़ पर चट्टान की तरह खड़े रहे।

राजनीतिक तपस्या: सांसद से मुख्यमंत्री तक
1980 में दुमका से लोकसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद से शिबू सोरेन ने संसद में झारखंड के मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया। उनके राजनीतिक करियर की प्रमुख उपलब्धियां:
संसदीय उपस्थिति: वे बार-बार दुमका के प्रतिनिधि के रूप में संसद पहुंचे और राष्ट्रीय राजनीति में झारखंड के मुद्दों को केंद्रीय स्थान दिलाया।
मुख्यमंत्रित्व काल: 15 नवंबर 2000 को राज्य गठन के बाद, उन्होंने तीन बार (2005, 2008, 2009) झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की कमान संभाली।
अजेय जनाधार: 2014 की भीषण मोदी लहर में भी, जब बड़े-बड़े दिग्गज धराशायी हो गए थे, शिबू सोरेन ने दुमका में अपना जनाधार बचाए रखा, जो उनकी जमीनी पकड़ का प्रमाण था।

एक युग का अंत: 4 अगस्त 2025
81 वर्ष की आयु में, लंबी बीमारी के बाद 4 अगस्त 2025 को सर गंगा राम अस्पताल, नई दिल्ली में उनका निधन हो गया। यह न केवल सोरेन परिवार के लिए, बल्कि समूचे झारखंड और आदिवासी समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति थी। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में भी, उन्होंने 15 अप्रैल 2025 को अपनी विरासत को कुशलतापूर्वक सौंपते हुए हेमंत सोरेन को झामुमो अध्यक्ष और स्वयं को ‘संस्थापक संरक्षक’ के रूप में स्थापित किया।
पद्म भूषण: एक राष्ट्र का नमन
पद्म भूषण सम्मान शिबू सोरेन के उस निस्वार्थ समर्पण को समर्पित है, जिसमें उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर झारखंड के जल, जंगल और जमीन की रक्षा को रखा। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, वे ‘दिशोम गुरु’ थे—एक ऐसा गुरु, जिसने आदिवासियों को अपना खोया हुआ गौरव वापस दिलाया और उन्हें सम्मान के साथ जीने की राह दिखाई।
आज जब उनकी पत्नी रूपी सोरेन जी ने राष्ट्रपति के हाथों यह सम्मान ग्रहण किया, तो वह झारखंड के करोड़ों लोगों के लिए भावुक गौरव का क्षण था। यह सम्मान सिद्ध करता है कि संघर्ष की लंबी यात्रा का अंत हमेशा सम्मान के साथ होता है। शिबू सोरेन जी भले ही आज भौतिक रूप में हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका विजन—एक सशक्त, स्वाभिमानी और विकसित झारखंड—हमेशा हमारे साथ रहेगा।
जाहिर है की शिबू सोरेन का जीवन संघर्षों की एक ऐसी महागाथा है, जो आने वाली पीढ़ियों को न्याय और स्वाभिमान के लिए लड़ने का साहस देती रहेगी। उन्हें मरणोपरांत मिला पद्म भूषण सम्मान भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता का प्रतीक है।
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