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90s vs Today: तब जेब खाली थी पर वक्त बहुत था, आज सुविधाएं बेहिसाब लेकिन अपनों के लिए समय कहां?

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कभी एक फोन कॉल के लिए इंतजार था, आज पूरी दुनिया एक क्लिक पर है. 90s में सुविधाएं कम थीं, लेकिन रिश्तों और दोस्तों के लिए वक्त था. आज स्मार्टफोन, OTT और ऑनलाइन शॉपिंग ने जिंदगी आसान बना दी है, मगर सवाल है- इस तेज रफ्तार में हम पीछे क्या छोड़ आए?

एक दौर था जब सुबह की शुरुआत मोबाइल के अलार्म से नहीं, बल्कि मां की आवाज, पापा की पुकार या घर के बड़े-बुजुर्गों की डांट से होती थी. टीवी पर पसंदीदा कार्यक्रम देखने के लिए पूरे हफ्ते इंतजार होता था और दोस्तों से मिलने के लिए किसी ऐप पर Online आने की जरूरत नहीं पड़ती थी. बस घर से निकले और मोहल्ले में दोस्त मिल गए.

आज जिंदगी बिल्कुल अलग है. स्मार्टफोन हाथ में है, दुनिया उंगलियों पर है और जरूरत का लगभग हर सामान घर बैठे मिल जाता है. तकनीक ने जिंदगी को आसान और तेज बनाया, लेकिन इसी रफ्तार के बीच रिश्तों, सेहत और साथ बैठकर बिताए जाने वाले समय का अंदाज भी बदल गया. आइए देखते हैं 90 के दशक से आज तक हमारी लाइफस्टाइल कितनी बदल चुकी है.

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तब मां की आवाज थी ‘अलार्म’, आज मोबाइल जगाता है

90 के दशक में ज्यादातर परिवारों की सुबह लगभग तय दिनचर्या से शुरू होती थी. बच्चे तैयार होकर स्कूल जाते, बड़े काम पर निकलते और शाम होते-होते परिवार के सदस्य फिर घर में एक साथ दिखाई देते थे.

आज सुबह आंख खुलने से लेकर रात में सोने तक स्मार्टफोन हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है. अलार्म बंद करते ही मैसेज और सोशल मीडिया देखने की आदत भी आम हो गई है. पढ़ाई, ऑफिस मीटिंग, शॉपिंग और मनोरंजन तक बहुत कुछ मोबाइल में सिमट गया है.

एक फोन के लिए इंतजार, आज सेकंड में वीडियो कॉल

90s में हर घर में टेलीफोन नहीं होता था. किसी रिश्तेदार या दोस्त से जरूरी बात करनी हो तो लैंडलाइन का सहारा लेना पड़ता था. कई बार फोन आने का बाकायदा इंतजार किया जाता था.

आज यह इंतजार लगभग खत्म हो चुका है. स्मार्टफोन से कुछ सेकंड में मैसेज भेज सकते हैं, वीडियो कॉल कर सकते हैं और सोशल मीडिया के जरिए दुनिया के किसी भी कोने में मौजूद व्यक्ति से जुड़ सकते हैं. दूरी कम हुई है, लेकिन आमने-सामने बैठकर लंबी बातचीत करने का अंदाज जरूर बदल गया है.

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तब टीवी के सामने पूरा परिवार, आज हर हाथ में अलग स्क्रीन

90 के दशक में मनोरंजन के साधन सीमित थे. टीवी पर पसंदीदा सीरियल या फिल्म आने का समय याद रखा जाता था. एक ही टीवी के सामने परिवार के कई सदस्य बैठते थे.

बच्चों की दुनिया भी स्क्रीन तक सीमित नहीं थी. गली में क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिंटन और दोस्तों के साथ दौड़-भाग रोजमर्रा का हिस्सा थी.

अब मनोरंजन 24 घंटे जेब में मौजूद है. OTT, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और शॉर्ट वीडियो ने इंतजार खत्म कर दिया है. जो देखना है, जब देखना है, तुरंत उपलब्ध है. इसके साथ स्क्रीन टाइम भी परिवारों के लिए नई चुनौती बन गया है.

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बाजार जाना भी कभी ‘फैमिली आउटिंग’ हुआ करता था

90s में खरीदारी का मतलब सिर्फ सामान खरीदना नहीं था. परिवार के साथ बाजार जाना, कई दुकानों पर घूमना, दुकानदार से मोलभाव करना और फिर सामान लेकर घर लौटना अपने आप में एक अनुभव था.

आज कपड़ों से लेकर किराना, इलेक्ट्रॉनिक्स और खाना तक मोबाइल पर कुछ क्लिक में दरवाजे तक पहुंच जाता है. कैश की जगह कार्ड और मोबाइल पेमेंट ने ले ली है. सुविधा कई गुना बढ़ी है और समय भी बचता है, लेकिन बाजार जाने वाला पुराना अनुभव काफी बदल चुका है.

घर की रसोई से फूड डिलीवरी तक

पहले घर का बना खाना रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा था. परिवार के साथ बैठकर खाना भी सामान्य दिनचर्या का हिस्सा हुआ करता था.

आज व्यस्त जीवन के बीच फूड डिलीवरी और रेडी-टू-ईट विकल्प आसानी से उपलब्ध हैं. इससे सुविधा जरूर बढ़ी है, लेकिन खान-पान और शारीरिक गतिविधियों में संतुलन बनाए रखना भी जरूरी हो गया है. बदलती दिनचर्या के बीच सेहत के लिए संतुलित भोजन और नियमित शारीरिक गतिविधि पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है.

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सोशल मीडिया ने जोड़ा भी, लेकिन साथ बैठने का समय घटा?

90s में लोगों के पास डिजिटल कनेक्टिविटी नहीं थी, लेकिन रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने-जुलने का तरीका सीधा था. छुट्टी मिली तो किसी के घर पहुंच गए. शाम हुई तो पड़ोसियों और दोस्तों के साथ बातचीत शुरू हो गई.

आज सोशल मीडिया ने सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों को भी जोड़ दिया है. मगर कई बार एक ही कमरे में बैठे लोग अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त दिखाई देते हैं. खाली समय का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया, चैट, वीडियो और फिल्मों में निकल सकता है.

तब इंतजार ज्यादा था, लेकिन शायद सुकून भी

90 के दशक की जिंदगी में आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं. फोन करने से लेकर खरीदारी और मनोरंजन तक कई चीजों के लिए इंतजार करना पड़ता था. फिर भी मुलाकात, बातचीत और परिवार के साथ बिताए समय की अपनी जगह थी.

आज तकनीक ने जिंदगी के कई मुश्किल काम आसान कर दिए हैं. दुनिया पहले से ज्यादा जुड़ी हुई है और सुविधाएं हमारी उंगलियों तक पहुंच चुकी हैं. लेकिन तेज रफ्तार जिंदगी के बीच सुकून, रिश्ते, सेहत और अपनों के लिए समय निकालने की जरूरत आज भी उतनी ही है.

90s बेहतर था या आज? जवाब शायद बीच में है

90s को पूरी तरह बेहतर और आज की जिंदगी को खराब कहना सही नहीं होगा. उस दौर की अपनी सीमाएं थीं और आज की तकनीक ने जिंदगी को कई मायनों में बेहतर और सुविधाजनक बनाया है. फर्क बस इतना है कि पहले सुविधाएं कम और इंतजार ज्यादा था, जबकि आज सुविधाएं ज्यादा हैं और समय कम महसूस होता है.

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Drishti Now Desk

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