निजी कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए कैसे की गई ऊर्जा नीति में परिवर्तन जिससे राज्य को कैसे हुआ कई हजार करोड़ का नुकसान… पढ़िए पूरी खबर
- निजी कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए कैसे की गई ऊर्जा नीति में परिवर्तन जिससे राज्य को कैसे हुआ कई हजार करोड़ का नुकसान… पढ़िए पूरी खबर……
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- झारखंड बिजली समझौता , ऊर्जा नीति संशोधन “अदाणी गोड्डा विवाद …झारखंड को कई हजार करोड़ का नुकसान
झारखंड में पहली बार गौतम अदाणी के आने के बाद एक बार फिर से चर्चा का बाजार गर्म है ….क्या यहां कोई नया निवेश होगा ? या फिर पहले से चली आ रही अडानी की कंपनियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की जाएगी ? इस दौरे से वैसे जनता को यह जानना भी जरूरी है कि आखिर गोड्डा में लगे इतने बड़े पावर प्लांट से झारखंड को क्या फायदा हो रहा है ? या फिर इस पावर प्रोजेक्ट से झारखंड को फायदा तो दूर नुकसान कितना हो रहा है ? क्या अदाणी झारखंड इसलिए आए थे । अदाणी पावर प्रोजेक्ट की बांग्लादेश के साथ वित्तीय लेनदेन को लेकर नहीं बन रही है बात ? या फिर इसलिए कि उन्हें अपने पावर प्रोजेक्ट का बिजली झारखंड में खपत करने की कोई योजना है ?
लेकिन इससे पहले राज्य की जनता को यह जानना चाहिए कि 2016 में सिर्फ अदाणी के लिए झारखंड सरकार ने ऊर्जा नीति में ऐसा क्या परिवर्तन किया जिससे राज्य को करोड़ों का नुकसान होने लगा ।हजारों किसानों की जमीन गई ।मुआवजे के लिए किसान लड़ते रहे । लेकिन किसानों की तो छोड़िए झारखंड प्रदेश को कोई फायदा इस अदानी प्रोजेक्ट से नहीं हुआ।
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर झारखंड की ऊर्जा नीति 2012 क्या कहती है?
झारखंड की ऊर्जा नीति (2012)
12 सितंबर 2012 को झारखंड सरकार ने अपनी ऊर्जा नीति अधिसूचित की थी। इसके एक प्रमुख प्रावधान के अनुसार:
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झारखंड में स्थापित किसी भी पावर प्लांट को अपनी कुल उत्पादित बिजली का 25% हिस्सा राज्य सरकार को देना अनिवार्य था।
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यह बिजली राज्य को रियायती दरों पर मिलनी थी, जिसमें 12% हिस्सा केवल परिवर्तनशील लागत (वेरियेबल कॉस्ट) पर और शेष 13% हिस्सा निश्चित और परिवर्तनशील दोनों लागतों के आधार पर तय कीमत पर दी जाती थी।
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इसका उद्देश्य राज्य के ऊर्जा संसाधनों का स्थानीय उपयोग सुनिश्चित करना और बिजली की कमी को दूर करना था।
- साथ ही राज्य को बिजली सस्ते दरों पर उपलब्ध होता।
- उर्जा नीति में संशोधन (अक्टूबर 2016)
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अक्टूबर 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास की बीजेपी सरकार ने ऊर्जा नीति में संशोधन किया।
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क्या बदला:
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- मूल शर्त को शिथिल करते हुए यह प्रावधान जोड़ा गया कि पावर प्लांट को 25% बिजली राज्य में खपत करने की बाध्यता नहीं होगी।
- वे इनके बराबर बिजली किसी अन्य प्लांट से भी राज्य को सप्लाई कर सकती थी । मोटे तौर पर यह संसोधन भले ही छोटी बात लगे लेकिन दूरगामी प्रभाव थे । एम ओ यू के मुताबिक झारखंड को 400 मेगावाट बिजली अब रियायत दर रुपए नहीं बल्कि महंगे रेट पर मिलने वाला था
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इस संशोधन को रघुवर दास की कैबिनेट ने मंजूरी दी थी ।
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प्रक्रिया पर सवाल:
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आरोप यह कि सरकार ने संशोधन से पहले कोई सर्वे नहीं कराया।
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न ही किसी विशेषज्ञ समिति की सलाह ली गई।
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अदाणी समूह के साथ समझौता (नवंबर 2016)
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ऊर्जा नीति में संशोधन के ठीक 15 दिन बाद।
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विवरण:
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झारखंड सरकार और अदाणी समूह के बीच एक सेकेंड लेवल एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) साइन हुआ।
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इसके तहत अदाणी पावर (झारखंड) लिमिटेड को गोड्डा में 800-800 मेगावॉट क्षमता के दो सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट (कुल 1600 मेगावॉट) बनाने की अनुमति दी गई।
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यह पूरी बिजली एक डेडिकेटेड ट्रांसमिशन लाइन के जरिए बांग्लादेश भेजी जानी थी।
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बांग्लादेश से करार:
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मीडिया खबरों के मुताबिक अदाणी समूह ने बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड के साथ 25 साल तक 1600 मेगावॉट बिजली आपूर्ति का समझौता किया था।
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मूल नीति के तहत 400 मेगावॉट (25%) झारखंड को देना पड़ता, जिससे बांग्लादेश को पूरी बिजली देना असंभव हो जाता।
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संशोधन ने इस बाधा को हटा दिया।
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झारखंड को नुकसान:
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झारखंड के तत्कालीन महालेखाकार ने ऊर्जा सचिव को पत्र लिखकर कहा था कि इस संशोधन से राज्य को हर साल 296 करोड़ रुपये और 25 साल में कुल 7410 करोड़ रुपये का नुकसान होगा।
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कारण: अब 400 मेगावॉट बिजली राज्य के बाहर से अधिक कीमत पर खरीदनी पड़ेगी, जबकि पहले यह रियायती दर पर गोड्डा से मिलती।
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बिजली की कीमत:
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2012 की नीति में 25% बिजली का एक हिस्सा सस्ते दाम पर मिलना था।
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जबकि अब पूरी 25% बिजली निश्चित और परिवर्तनशील लागत के आधार पर तय कीमत पर ली जानी थी.., जिससे सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ा।
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आरोप
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उस वक्त के कई राजनेताओ ने आरोप लगाया की ऊर्जा नीति में संशोधन अदाणी समूह को फायदा पहुँचाने के लिए किया गया।
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जमीन की कीमतों के निर्धारण, जनसुनवाई, और पर्यावरण सुनवाई में फर्जीवाड़ा हुआ।
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सरकार पहले से ही एनटीपीसी, डीवीसी, और नेशनल ग्रिड से बिजली खरीदती है, फिर अदाणी के बाहर के प्लांट से महंगी बिजली खरीदने की क्या जरूरत?
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इससे राज्य को आर्थिक नुकसान होगा।
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सरकार और अदाणी का बचाव
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झारखंड सरकार:
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हालांकि उस वक्त तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री
ने यह कह कर बचाव किया की संशोधन बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों को ध्यान में रखकर किया गया, न कि किसी कॉरपोरेट को लाभ देने के लिए।
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झारखंड को 400 मेगावॉट बिजली मिलेगी, बस वह बाहर के प्लांट से आएगी।
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बिजली की दरें झारखंड राज्य विद्युत नियामक आयोग तय करेगा, जो घाटे का सौदा नहीं होने देगा।
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मुख्य विवाद के बिंदु
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नीति में संशोधन का मकसद:
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क्या यह वास्तव में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के लिए था या अदाणी को फायदा पहुँचाने की मंशा थी?
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आर्थिक नुकसान:
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क्या 7410 करोड़ रुपये का अनुमानित नुकसान सही है?
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