डिजिटल इंडिया की चमक से दूर झारखंड के 50 गांव: नेटवर्क के लिए आज भी पहाड़ों और पेड़ों का सहारा

डिजिटल इंडिया की चमक से दूर झारखंड के 50 गांव: नेटवर्क के लिए आज भी पहाड़ों और पेड़ों का सहारा

डिजिटल इंडिया की चमक से दूर झारखंड के 50 गांव: नेटवर्क के लिए आज भी पहाड़ों और पेड़ों का सहारा

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डिजिटल इंडिया की चमक से दूर झारखंड के 50 गांव: नेटवर्क के लिए आज भी पहाड़ों और पेड़ों का सहारा

रांची/चतरा: भारत जहाँ एक ओर 5G की सुपरफास्ट रफ्तार का जश्न मना रहा है, वहीं झारखंड के पहाड़ी और जंगली इलाकों में बसे सैकड़ों ग्रामीणों के लिए मोबाइल सिग्नल आज भी एक सपना है। राज्य के 50 से अधिक गांव ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ का सामना कर रहे हैं, जहाँ फोन बात करने के लिए नहीं, बल्कि केवल कैमरा और कैलकुलेटर के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं।

शिक्षा और स्वास्थ्य पर संकट

इन इलाकों में स्थिति इतनी गंभीर है कि स्कूल के शिक्षकों को ऑनलाइन हाजिरी भरने के लिए स्कूल की छतों या ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ना पड़ता है। धनबाद, लातेहार, हजारीबाग और चतरा जिलों के दर्जनों गांवों में बच्चे डिजिटल शिक्षा से पूरी तरह वंचित हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं का हाल और भी बुरा है। मेडिकल इमरजेंसी के समय 108 एम्बुलेंस बुलाने के लिए ग्रामीणों को मीलों पैदल चलकर या ऊंचे पेड़ों पर चढ़कर सिग्नल ढूंढना पड़ता है। कई बार सिग्नल मिलने तक मरीज की स्थिति गंभीर हो जाती है।

तकनीकी चुनौती और सरकारी आश्वासन

जनकारी के मुताबिक़ इन क्षेत्रों में वर्तमान में BSNL का 700 MHz बैंड काम कर रहा है, जो घने जंगलों के लिए पर्याप्त नहीं है। बेहतर कनेक्टिविटी के लिए यहाँ 2100 MHz बैंड और अधिक टावरों की आवश्यकता है।
विधायक जनार्दन पासवान ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा, “मैंने दूरसंचार विभाग से बात की है। नए टावर और सैटेलाइट कनेक्टिविटी पर काम शुरू किया जाएगा। अगले तीन महीनों में इन गांवों की स्थिति में सुधार देखने को मिलेगा।”

समाधान की ओर कदम

केंद्र सरकार ने डिजिटल इंडिया योजना के तहत झारखंड के लिए 500 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। भविष्य में इन दुर्गम इलाकों को जोड़ने के लिए तीन मुख्य स्तरों पर काम करने की योजना है:

सैटेलाइट इंटरनेट (VSAT): दुर्गम पहाड़ियों के लिए। हाई-बैंड टावर: बेहतर सिग्नल स्ट्रेंथ के लिए।
फाइबर नेटवर्क: स्थायी और तेज इंटरनेट के लिए।

जाहिर है झारखंड के ये गांव याद दिलाते हैं कि विकास की असली परिभाषा तब पूरी होगी, जब ‘डिजिटल इंडिया’ का सिग्नल देश के आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचेगा।

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