सिद्धो-कान्हू जयंती: सीएम हेमंत सोरेन ने वीर शहीदों को दी श्रद्धांजलि, कहा— “जल-जंगल-जमीन की लड़ाई को दी नई दिशा
सिद्धो-कान्हू जयंती: सीएम हेमंत सोरेन ने वीर शहीदों को दी श्रद्धांजलि, कहा— “जल-जंगल-जमीन की लड़ाई को दी नई दिशा
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संतोष दीपक/ रांची
राँची: अमर शहीद सिद्धो-कान्हू की जयंती के अवसर पर आज मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी पत्नी और गांडेय विधायक कल्पना सोरेन के साथ राँची के मोरहाबादी स्थित सिद्धो-कान्हू पार्क पहुँचकर वीर शहीदों को नमन किया। इस दौरान उन्होंने अमर शहीद सिद्धो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर अपनी श्रद्धासुमन अर्पित की।
इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है संघर्ष: मुख्यमंत्री
कार्यक्रम के दौरान मीडिया को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि सिद्धो-कान्हू का व्यक्तित्व और उनका संघर्ष भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है। उन्होंने कहा, *”करीब 200 साल पहले सिद्धो-कान्हू ने जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए जो लंबी लड़ाई लड़ी, उसने समाज को एक नई चेतना प्रदान की। आज उनकी जयंती पर पूरा देश और आदिवासी समुदाय गर्व महसूस करता है।
झारखंड की अस्मिता के प्रतीक हैं वीर शहीद
मुख्यमंत्री ने झारखंड की धरती को महान विभूतियों की जननी बताते हुए कहा कि हमें फख्र है कि यहाँ ऐसे वीरों ने जन्म लिया। उन्होंने कहा कि इन महापुरुषों ने तत्कालीन व्यवस्था को एक ऐसी दिशा में मोड़ा जो आज भी राज्य के विकास और अधिकारों की रक्षा के लिए हमारा मार्ग प्रशस्त करती है।
मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर राज्यवासियों को बधाई देते हुए कहा कि हर साल उनकी जन्मस्थली और शहादत स्थल पर उमड़ने वाली भीड़ यह दर्शाती है कि उनके विचार आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं।
कार्यक्रम की मुख्य बातें:
स्थान: मोरहाबादी सिद्धो-कान्हू पार्क, राँची।
उपस्थिति: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना सोरेन।
श्रद्धांजलि: सिद्धो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण।
संदेश: जल-जंगल-जमीन की रक्षा और आदिवासी अस्मिता का सम्मान।
सिधो कान्हू जयंती …इतिहास
सिद्दू कानू भोगनाडीह के महान आदिवासी क्रांतिकारी थे, जिन्होंने 30 जून 1855 को अंग्रेजों और जमींदारों के शोषण के खिलाफ ऐतिहासिक ‘संथाल हूल’ (क्रांति) का नेतृत्व किया। प्रतिवर्ष 11 अप्रैल को उनकी जयंती और 30 जून को ‘हूल दिवस’ के रूप में उनके साहस को याद किया जाता है।
ईस्ट इंडिया कंपनी की औपनिवेशिक नीतियों, जमींदारों की शोषणकारी व्यवस्था और बाहरी लोगों द्वारा किए जा रहे अत्याचार के खिलाफ यह हूल (क्रांति) शुरू हुआ था।
क्रांति की शुरुआत: 30 जून 1855
सिधो-कान्हू ने “करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो” का नारा दिया था।
जाहिर है मुख्यमंत्री का महान विभूतियों को सम्मान देना झारखंड की गौरवशाली संस्कृति और वीर शहीदों के प्रति उनकी लगाव और सम्मान को प्रदर्शित करता है।















