चाईबासा: सत्ताधारी दल ने खोले नाम, फिर भी ‘आयरन माफिया’ पर मेहरबान प्रशासन; आखिर किसका है संरक्षण?
चाईबासा: सत्ताधारी दल ने खोले नाम, फिर भी ‘आयरन माफिया’ पर मेहरबान प्रशासन; आखिर किसका है संरक्षण?
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चाईबासा (पश्चिमी सिंहभूम): झारखंड में अवैध खनन का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है। इस बार मामला पश्चिमी सिंहभूम के चाईबासा का है, जहाँ अवैध लौह अयस्क (Iron Ore) के काले कारोबार ने न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचाया है, बल्कि राज्य की सियासत और ब्यूरोक्रेसी के बीच के गठजोड़ को भी बेनकाब कर दिया है।
सत्ता पक्ष ने दिए नाम, फिर भी FIR से बच रही पुलिस
हैरानी की बात यह है कि इस अवैध धंधे के खिलाफ किसी विपक्षी दल ने नहीं, बल्कि सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के जिला अध्यक्ष ने मोर्चा खोला है। झामुमो जिला अध्यक्ष ने उपायुक्त (DC) को सौंपे ज्ञापन में बाकायदा सन्नी सिंह और अरविंद चौरसिया जैसे नामों का खुलासा किया है। बावजूद इसके, जिला प्रशासन और पुलिस अब तक प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई है।
आईवाश’ या कार्रवाई? जांच की सुस्त चाल पर सवाल
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि ज्ञापन के बाद प्रशासन ने दिखावे के लिए कुछ जगहों पर खनन रोक दिया है। लेकिन इसे महज एक आईवाश’ माना जा रहा है। सवाल यह है कि:
जब नाम सार्वजनिक हैं, तो जांच टीम आरोपियों के गिरेबान तक क्यों नहीं पहुँची?
क्या जिला प्रशासन के पदाधिकारी अपनी ही सरकार के संगठन (JMM) की बात को अनसुना कर रहे हैं?
सन्नी सिंह और अरविंद को बचाने के पीछे कौन सा सफेदपोश हाथ है?
कई जिलों में फैला है सन्नी सिंह का जाल
चर्चा है कि सन्नी सिंह का प्रभाव सिर्फ पश्चिमी सिंहभूम तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका सिंडिकेट झारखंड के कई अन्य जिलों में भी सक्रिय है। बड़े पैमाने पर हो रहे इस अवैध खनन से सरकार को करोड़ों के राजस्व की चपत लग रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि यदि सत्ताधारी दल के जिला अध्यक्ष की मांग पर कार्रवाई नहीं हो रही, तो आम जनता की सुनवाई की उम्मीद क्या ही की जाए।
जेएमएम जिला अध्यक्ष का रुख: गेंद प्रशासन के पाले में
झामुमो जिला अध्यक्ष ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उनका काम माफियाओं को चिन्हित कर प्रशासन को अवगत कराना था, जो उन्होंने कर दिया है। अब जांच करना और दोषियों को जेल भेजना जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है। उनके इस बयान ने सीधे तौर पर उपायुक्त और पुलिस प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
ऐसी स्थिति में आम लोग पूछ रहे है ली क्या झारखंड के पदाधिकारी अब बेलगाम हो चुके हैं? यदि सरकार के अपने लोगों द्वारा सबूत और नाम देने के बाद भी कार्रवाई अधर में है, तो यह ‘सिस्टम’ की मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
सरकार के लिए बन सकती है असहज स्थिति
अगर जल्द ही इस मामले में कड़ी कानूनी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मुद्दा आने वाले समय में राज्य सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है। जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि केवल खनन रोकना समाधान नहीं है, बल्कि माफियाओं और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों को बेनकाब करना जरूरी है।














